देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून अब अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है. इस बार मॉनसून कमजोर रहा है और बारिश का वितरण भी असमान रहा है. कई जिलों को इस साल कमजोर मानसून और एल नीनो के संभावित असर के लिहाज से सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया था, उनमें बड़ी संख्या अब बारिश की कमी से जूझ रही है.
डाउन टू अर्थ वेबसाइट में छपी एक एनालिसिस रिपोर्ट के मुताबिक, 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के ऐसे 315 संवेदनशील जिलों में से 147 जिलों यानी करीब 47 फीसदी में 1 जून से 30 अगस्त के बीच सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई.
सबसे चिंता की बात यह है कि इन जिलों में बड़ी संख्या ऐसे इलाकों की है जहां खेती सिंचाई के बजाय पूरी तरह मानसूनी बारिश पर निर्भर है. इसका साफ अर्थ यह है कि अगर मानसून के आखिरी महीने में भी बारिश सामान्य नहीं हुई तो इसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि फसल उत्पादन, ग्रामीण आय, पानी की उपलब्धता और खाद्य कीमतों पर भी पड़ सकता है.
आखिर इन 315 जिलों को संवेदनशील क्यों माना गया?
- केंद्र सरकार ने जून में 315 जिलों की पहचान कमजोर या अनिश्चित मानसून.
- संभावित एल नीनो के असर से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले क्षेत्रों के तौर पर की थी.
- इन जिलों को उनकी सिंचाई सुविधा के आधार पर तीन श्रेणियों में बांटा गया.
- पहली श्रेणी में 111 हाई-प्रायोरिटी जिले हैं. यहां 25 फीसदी से भी कम कृषि क्षेत्र सिंचित है..
- दूसरी श्रेणी में 76 मीडियम-प्रायोरिटी जिले हैं, जहां 25 से 50 फीसदी कृषि क्षेत्र सिंचित है.
- तीसरी श्रेणी में 128 लो-प्रायोरिटी जिले हैं, जहां 50 फीसदी से ज्यादा कृषि क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा है.

कहां-कहां हुई सबसे कम बारिश?
- कम या बहुत कम बारिश वाले 147 जिलों में से 40 जिले उन 111 हाई-प्रायोरिटी जिलों में शामिल हैं, जिन्हें सबसे ज्यादा संवेदनशील माना गया.
- यानी सबसे ज्यादा जोखिम वाले 111 हाई-प्रायोरिटी जिलों में करीब 36 फीसदी को सामान्य से कम या बहुत कम बारिश मिली.
- कर्नाटक के रामनगर में 1 जून से 30 अगस्त के बीच सिर्फ 19 मिमी बारिश हुई.
- रामनगर में इस अवधि में सामान्य बारिश 283.5 मिमी होनी चाहिए थी, यानी यहां करीब 93 फीसदी बारिश की कमी रही.
- मेघालय के वेस्ट गारो हिल्स में भी सामान्य से 72 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई.
- असम के 8 हाई-प्रायोरिटी जिलों में से 7 में 21 से 54 फीसदी तक बारिश की कमी रही.
- महाराष्ट्र के 22 हाई-प्रायोरिटी जिलों में से 7 में सामान्य से 28 से 40 फीसदी तक कम बारिश हुई.
- मीडियम-प्रायोरिटी जिलों में भी स्थिति चिंताजनक है.
- 76 में से 43 यानी करीब 57 फीसदी जिलों में सामान्य से कम या बहुत कम बारिश हुई.
- कर्नाटक के हासन में सामान्य से 63 फीसदी कम बारिश हुई, जिससे सूखे जैसे हालात बने हैं.
- असम के नलबाड़ी में बारिश 61 फीसदी कम रही.
- वहीं मेघालय के नॉर्थ गारो हिल्स में सामान्य से 67 फीसदी कम बारिश दर्ज की गई.
- बारिश की इस कमी का असर धान जैसी मानसून पर निर्भर फसलों पर पड़ने का खतरा बढ़ गया है.
क्या सिर्फ कम बारिश ही समस्या है?
इस साल की सबसे बड़ी चिंता बारिश का बेहद असमान और अनिश्चित होना है. 147 संवेदनशील जिलों में जहां बारिश कम हुई, वहीं 30 जिलों में सामान्य से ज्यादा या बहुत ज्यादा बारिश भी हुई. हाई-प्रायोरिटी जिलों में करीब 36 फीसदी को कम बारिश मिली, जबकि 17 फीसदी में ज्यादा बारिश हुई.उत्तराखंड के बागेश्वर में सामान्य से करीब 152 फीसदी ज्यादा बारिश हुई. इससे वहां जलभराव और बाढ़ का खतरा बढ़ गया.
उत्तराखंड के बागेश्वर में सामान्य से करीब 152 फीसदी ज्यादा बारिश हुई. महाराष्ट्र का नासिक इस बदलते मौसम का एक अहम उदाहरण है. यहां जून के मध्य से जुलाई की शुरुआत तक लगातार चार हफ्ते कम बारिश हुई. इसके बाद आठ हफ्तों तक सामान्य से ज्यादा बारिश होती रही और पूरे मानसून सीजन में 55 फीसदी बारिश ज्यादा हो गई.
देश में कितने जलाशय सूखने की कगार पर?
केंद्रीय जल आयोग (CWC) की तरफ से पेश किए गए आंकड़ों के 23 जुलाई तक के आंकड़ों के अनुसार देश के 166 बड़े जलाशयों में 70.432 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) पानी है. यह उनकी कुल लाइव स्टोरेज क्षमता का सिर्फ 38.37 प्रतिशत है. यह पिछले साल की तुलना में तकरीबन 36 प्रतिशत कम है. लेकिन यह स्तर अब भी एवरेज औसत के करीब है, लेकिन एक साल के जलाशयों में पानी के स्टोरेज में इतनी बड़ी गिरावट चिंता का विषय जरूर है.
केंद्रीय जल आयोग (CWC) की रिपोर्ट के मुताबिक 166 में से 54 जलाशयों में पानी सामान्य स्तर के 80% या उससे भी कम है.इनमें से 22 जलाशयों में सामान्य के आधे या उससे भी कम पानी बचा है. इनमें श्रीशैलम, नागार्जुन सागर, तुंगभद्रा, कृष्णराज सागर, पेरियार, तवा, वैगई, अलीयार और सिंगूर जैसे महत्वपूर्ण जलाशय शामिल हैं.
क्या देश में सूखे का खतरा बढ़ रहा है?
इंडिया ड्रॉट माइनर पोर्टर के आकलन में देश के करीब 39.8 फीसदी हिस्से में इस समय सूखे की स्थिति दर्ज की गई है. एक सप्ताह पहले यह आंकड़ा 38.9 फीसदी था. कम से कम नौ हाई-प्रायोरिटी जिलों में पूरे जिलों के क्षेत्र में सूखे की स्थिति दर्ज की गई है. इसमें असम, अरुणाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर और पश्चिम बंगाल के जिले शामिल हैं. कम बारिश का असर सिर्फ खेतों और फसल के उत्पादन पड़ रहा है. किसानों को उस समय पानी नहीं मिल रहा जब फसल को इसकी जरूरत है और बाद में अचानक भारी बारिश फसल को नुकसान पहुंचा रही है.लंबे समय तक सूखा रहने से भूजल रिचार्ज कम होता है, प्राकृतिक झरनों का प्रवाह घट सकता है और ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की समस्या भी बढ़ सकती है.

सचिन धर दुबे
सचिन धर दुबे को डिजिटल पत्रकारिता में करीब 7 साल का अनुभव है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत साल 2018 में न्यूज 18 से की. फिर गांव कनेक्शन, ANI, आजतक होते हुए अब TV9 Hindi तक पहुंचे. न्यूज 18 में असाइनमेंट पर कॉपी एडिटर, गांव कनेक्शन में मल्टीमीडिया जर्नलिस्ट, ANI में कंटेंट राइटर और आजतक में सीनियर सब एडिटर पद पर काम किया. सचिन ने कृषि पत्रकारिता में काफी समय बिताया. उनकी राजनीति, विश्व, स्पोर्ट्स, हिस्ट्री ओरिएंटेड विषयों पर लिखने में काफी इंटरेस्ट है. सचिन ने गांव कनेक्शन में रहते हुए ग्राउंड रिपोर्टिंग में भी हाथ आजमाया है. उन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय से Msc इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है. उत्तर प्रदेश में गोरखपुर के रहने वाले हैं.
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