बिहार से करीब 300 किलोमीटर दूर नेपाल में तिब्बत से आई अचानक बाढ़ ने तबाही मचा दी है। भोटेकोशी और त्रिशूली नदी के पानी ने रसुवा, टिमुरे और स्याब्रुबेसी इलाके को तहस-नहस कर दिया है। गांव के गांव बह गए, बाजार तबाह हो गए, पुल टूट गए और सड़कें कट गईं।
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नेपाल में आई तबाही पर बिहार सरकार अलर्ट है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से गृह मंत्री अमित शाह ने बात की है और NDRF की टीम को सीमावर्ती जिलों में तैनात कर दिया है।
नेपाल में आई तबाही से बिहार को खतरा क्यों, क्या यहां भी तबाही मचेगी, समझेंगे; बूझे की नाही में...।
सवाल-1: नेपाल के रसुवा में बाढ़ और तबाही कैसे आई है?
जवाबः 26 अगस्त की सुबह करीब 9 बजे नेपाल के रसुवा और नुवाकोट जिले में भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में अचानक बहुत तेज पानी आया। पानी तिब्बत की तरफ से आया और कुछ ही समय में घर, सड़क, पुल और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट बहा ले गया। उस समय रसुवा में ऐसी भारी स्थानीय बारिश की सूचना नहीं थी, इसलिए सामान्य बारिश से आई बाढ़ की संभावना कम मानी जा रही है।
कैसे हुआ?
- शुरुआती वैज्ञानिक आकलन के मुताबिक, बर्फ और चट्टान का बड़ा हिस्सा पहाड़ से गिरकर ल्हेंदे नदी के रास्ते में आ गया। इससे पानी कुछ समय के लिए रुक गया। फिर यह प्राकृतिक रुकावट टूटी और जमा पानी अचानक नीचे की ओर आया। इससे फ्लैश फ्लड जैसी स्थिति बनी।
- ग्लेशियल झील फटने की आशंका की भी जांच की जा रही है, लेकिन अभी इसकी पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए फिलहाल इसे सीधे 'GLOF' कहना जल्दबाजी होगी।
कितना नुकसान?
नेपाल पुलिस के मुताबिक, अब तक 95 लोगों के मौत की खबर है। नेपाल के पर्यटन विभाग के मुताबिक 500 से ज्यादा लोगों का पता नहीं चल रहा है। इनमें 133 भारतीय समेत 300 से ज्यादा विदेशी पर्यटक हैं।
- बाढ़ का असर रसुवा से नुवाकोट, धादिंग होते हुए चितवन तक देखा गया। रसुवा में टिमुरे, स्याफ्रुबेसी, हाकुबेसी, मेलुंग, सल्लेटार, शांतिबाजार, पैरेबेसी, खाल्टी बस्ती और बेत्रावती समेत करीब एक दर्जन बस्तियां प्रभावित हुईं। बाढ़ धादिंग के गल्छी तक पहुंची और आगे मुग्लिन की ओर बढ़ने की चेतावनी दी गई।
- बेत्रावती से रसुवागढ़ी-तिब्बत सीमा तक करीब 42 किमी सड़क पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुई। इसके अलावा स्याफ्रुबेसी से सीमा तक 16 किमी सड़क को भी नुकसान पहुंचा।
- शुरुआती जानकारी के मुताबिक, रसुवा और नुवाकोट जिलों में कम से कम 13 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट प्रभावित हुए हैं। इनमें चालू और निर्माणाधीन दोनों परियोजनाएं शामिल हैं।
- लांगटांग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को भी भारी नुकसान की खबर है। 20 मेगावाट की इस निर्माणाधीन परियोजना का पावरहाउस बाढ़ में पूरी तरह बह गया है। यहां 60 लोग लापता बताए जा रहे हैं।

नेपाल-तिब्बत सीमा पर भोटेकोशी नदी में पानी का तेज बहाव नीचे आता दिख रहा है।
सवाल-2: भोटेकोशी और त्रिशूली नदी में आई तबाही से बिहार को खतरा क्यों?
जवाबः नेपाल में आई तबाही से बिहार के खतरों को समझने के लिए भोट कोशी और त्रिशूली नदियों के तंत्रों को समझना होगा…
त्रिशूली नदी के पानी से 5 जिलों को खतरा
रसुवा नेपाल का उत्तरी, हिमालयी जिला है और चीन के तिब्बत से लगा है। टिमुरे/रसुवागढ़ी और स्याब्रुबेसी इसी क्षेत्र में हैं। यहां की नदियां ऊंचे हिमालय से निकलकर बहुत तेज ढाल वाले एरिया में नीचे उतरती हैं। इसी क्षेत्र में त्रिशूली नदी का डिस्चार्ज अचानक बढ़ता है तो पानी तेजी से नीचे आता है।
- यहां बाढ़ का पहला और सबसे बड़ा असर रसुवा और आसपास के पहाड़ी इलाकों में होता है। त्रिशूली दक्षिण की ओर बहते हुए नेपाल के मध्य में आती है। आगे जाकर यह देवघाट के पास काली गंडकी नदी से मिलती है। और इसका नाम नारायणी हो जाता है।
- नारायणी पहाड़ी इलाके से आगे बढ़ते हुए मैदानी इलाके में आती है और बिहार के वाल्मीकिनगर (पश्चिम चंपारण) में प्रवेश कर जाती है। बिहार में एंट्री करते ही इसका नाम गंडक हो जाता है। गंडक नदी आगे बढ़ते हुए हाजीपुर में आकर गंगा नदी में मिल जाती है।
- त्रिशुली नदी में पानी तेजी से बढ़ रहा है। इसका मतलब कि अगले कुछ घंटों में गंडक नदी में इसका असर देखने को मिलेगा। पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज, सारण और मुजफ्फरपुर जिले के दियारा इलाकों में पानी तेजी से बढ़ेगा।

भोटेकोशी से कोसी इलाके में खतरा
भोटेकोशी नेपाल के उत्तरी हिस्से में चीन-तिब्बत सीमा से निकलने वाली हिमालयी नदी है। यह सिंधुपालचोक क्षेत्र से होकर बहती है।
- यह नीचे उतरते हुए सुनकोशी, सप्तकोशी नदी में मिलती है। नेपाल के हनुमान नगर के पास भीमनगर बराज से बिहार में प्रवेश करती है। यह सुपौल जिले के बीरपुर के पास है। तब इसका नाम कोसी नदी हो जाता है। जिसे बिहार में शोक की नदी कहा जाता है।
- यह आगे चलकर कटिहार के कुरसेला के पास गंगा में मिलती है। कोसी में कमला और बागमती नदी का पानी भी मिलता है।
- इसलिए भोटेकोशी में अधिक पानी आने पर उसका पानी सुनकोशी और फिर कोसी नदी तंत्र में शामिल हो सकता है। इससे सुपौल, सहरसा, मधेपुरा और खगड़िया जिले काफी प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि, अबकी बार 2008 वाले हालात नहीं
- 2008 में नेपाल के कुसहा में कोसी नदी का तटबंध टूट गया था। इसके बाद कोसी नदी अपने नए/प्राकृतिक रास्ते को छोड़कर सैकड़ों साल पुराने पूर्व की ओर वाले रास्ते पर बहने लगी।
- इससे अचानक नदी का रुख घनी आबादी और नए इलाकों की तरफ मुड़ गया, जिससे बिहार के 34 लाख से अधिक लोग बिना किसी पूर्व चेतावनी के भीषण बाढ़ की चपेट में आ गए।
- हालांकि, इस बार रसुवा में लैंडस्लाइड, भूस्खलन या हिम झील टूटने से अचानक नदी में भारी मात्रा में पानी आ गया है। लेकिन नदी ने अपना रास्ता नहीं बदला है। वह अपने तय रास्ते पर बह रही है। इस कारण एक्सपर्ट तटबंध टूटने की संभावना व्यक्त नहीं कर रहे हैं।

सवाल-3: कितना नुकसान हो सकता है, बिहार सरकार क्या कर रही है?
जवाबः अभी नुकसान का आकलन करना जल्दीबाजी होगी। गंडक और कोसी बेसिन की नदियों में पानी बढ़ना चालू है। लेकिन गति सामान्य है। CM सम्राट चौधरी ने मुख्य सचिव, आपदा प्रबंधन और जल संसाधन विभाग के अधिकारियों के साथ बैठक कर स्थिति की समीक्षा की।
डिप्टी CM और जल संसाधन मंत्री विजय चौधरी ने कहा कि लोग सतर्क रहें, घबराएं नहीं। अगले 24 घंटे अलर्ट रहने की जरूरत है। समस्या पहले से बड़ी है, लेकिन फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है। गंडक नदी पर दबाव बढ़ने की आशंका है।
उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से बाढ़ राहत के लिए अतिरिक्त टीमों की तैनाती की गई है। राहत एवं बचाव के लिए जरूरी सामग्री भी उपलब्ध कराई गई है।

बुधवार दोपहर के बाद गंडक में पानी की रफ्तार तेज देखी गई। तस्वीर बगहा बैराज की है।
सरकार अलर्ट, बोली-डरे नहीं
- वाल्मीकिनगर बैराज हाई अलर्ट पर: पानी के भारी दबाव और संभावित बढ़ोतरी को देखते हुए पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकिनगर गंडक बैराज के सभी 36 फाटक खोल दिए गए हैं। सारे अफसरों की अगले 4 दिन तक की छुट्टियों को रद्द कर दिया गया है।
- NDRF और SDRF की तैनाती: निचले इलाकों और तटबंधों के भीतर रहने वाले लोगों को माइकिंग के जरिए सतर्क किया जा रहा है तथा सुरक्षित स्थानों पर जाने की सलाह दी गई है।
- इमरजेंसी कंट्रोल रूम सक्रिय: जल संसाधन विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग चौबीसों घंटे स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। इमरजेंसी टोल-फ्री नंबर (1800-345-6145) भी जारी किया गया है।
सवाल-4ः नेपाल की नदियों से बिहार में क्यों आती है बाढ़?
जवाबः नेपाल बिहार से करीब 400 फीट ऊंचाई (समुंद्र तल से) पर स्थित है। नेपाल में भारी बारिश होती है तो पानी ऊपर से नीचे की तरफ नेचुरल ग्रेविटी के कारण आता है। नेपाल में कोई बड़ा डैम नहीं है। जिससे पानी को कंट्रोल किया जा सके।
नेपाल हिमालय पर बसा है। इसका करीब 75% हिस्सा पहाड़ी क्षेत्र है। कोसी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला बलान, महानंदा और अधवारा नदियों का समूह यहां से निकलता है। नेपाल में बारिश होने पर पानी इन्हीं नदियों के रास्ते गंगा नदी तक पहुंचता है।
129 साल से चल रही हाई डैम बनाने की बात
उत्तर बिहार को बाढ़ से मुक्ति दिलाने के लिए 1897 से ही भारत और नेपाल की सरकारों के बीच सप्तकोशी नदी पर बांध की बात चल रही है। इसे लेकर आजादी से पहले और बाद में दोनों देशों की सरकारों के बीच कई बार वार्ताएं हुईं। आखिरकार 1991 में दोनों देशों के बीच इसे लेकर एक समझौता भी हुआ।
2004 में इस प्रस्तावित बांध की संभावनाओं को तलाशने के लिए नेपाल के धरान में एक संयुक्त परियोजना कार्यालय भी बना है। मगर 129 साल से अधिक समय बीतने के बावजूद आज तक नेपाल के बराह क्षेत्र से 1.6 किमी उत्तर की दिशा में प्रस्तावित इस बांध के निर्माण को लेकर सहमति नहीं बन पाई है।

21 अगस्त को दिल्ली में वित्त मंत्री और विदेश मंत्री के साथ बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बैठक की थी। इसमें बाढ़ से संबंधित समस्याओं पर एक्शन प्लान बना था।
21 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर के साथ बैठक की। इसके बाद वित्त मंत्री ने कोसी-मेची परियोजना के पहले चरण की राशि जारी करने और दूसरे चरण की तकनीकी मंजूरी देने का निर्देश जल शक्ति मंत्रालय को दिया है।
CM सम्राट चौधरी ने कहा कि बाढ़ के स्थायी समाधान के लिए कोसी नदी पर उच्च बांध की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट जल्द बनेगी। JDU नेता संजय झा ने बताया, 'नेपाल में हाई डैम का निर्माण एकमात्र समाधान है, जिसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) 2028 तक बन जाएगी।'