
ये 80 के दशक की स्टाइल की बात है
80s Style Entertainment:अस्सी के दशक में मोबाइल फोन नहीं था लेकिन अस्सी का ज़माना आज मोबाइल फोन पर लौट आया है. पुराने दौर के नॉस्टेल्जिया का अपना सुरूर होता है, जब याद आता है तो अलग-अलग फ्लेवर्स के साथ दिलो दिमाग पर असर करते हैं. सोशल मीडिया पर गुजरे ज़माने की बयार चल पड़ी है- मानो बागों में बहार है और हमको तुमसे प्यार है. उन सितारों की यादें नई चमक से साथ लौट आई है, जिन्होंने अस्सी के दशक में सिनेमा हॉल, बॉक्स ऑफिस और बाजार को चकाचौंध से भर दिया था. कोई बेल बॉटम में अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना बनने की कोशिश कर रहे हैं तो कोई डिस्को म्यूजिक और लाइट्स के साथ मिथुन चक्रवर्ती. कोई जिन्स और किप फिट पैंट में जितेंद्र तो कोई रंगे-बिरंगे जैकेट में ऋषि कपूर की शख्सियत को सेलिब्रेट कर रहे हैं.
गौर कीजिए तो इस चलन में कोई जेंडर बायस नहीं हैं. फैशन के लिहाज से अस्सी के दशक में ऐसी सोच रही हो लेकिन आज मार्केट में यूनिसेक्स प्रोडक्ट्स की भी भरमार हैं. अस्सी के दशक का फैशन आज की युवतियों और महिलाओं के भी सर चढ़ कर बोल रहा है. काला चश्मा, साड़ी, नीला दुपट्टा-पीला सूट में हेमा, रेखा, जया, ज़ीनत, रीना, परवीन आदि सब की छवियां वायरल हैं. ब्रॉड ब्लेजर और चमकीले पॉप कलर्स की वापसी हुई है, जो अस्सी के दशक में सिल्वर स्क्रीन पर देखे जाते थे. वहीं बड़े चश्मे, चौड़ी बेल्ट और मोटे गोल्ड कफ जैसे बोल्ड एक्सेसरीज भी फोटो फ्रेम की शोभा बढ़ा रहे हैं. ऋषि कपूर और नीतू सिंह को कई बार इस लुक में देखा गया है.
भारत ही नहीं दुनिया भर में 80s ट्रेंड
सोशल मीडिया ऐसी तस्वीरों से भरा पड़ा है. अब सवाल ये है कि अस्सी के दशक के एंटरटेनमेंट, फैशन और गाने में आखिर ऐसी क्या बात है कि लोग उसके अचानक से मुरीद हो गए. कंटेंट वायरल कैसे हो गया. रिपोर्ट्स बताती है कि भारत ही नहीं बल्कि पश्चिमी मुल्कों में भी रेट्रो की वापसी देखी जा रही है. भारत में बॉलीवुड तो पश्चिमी देशों में हॉलीवुड फैशन का असर छाया है. इसे ‘मैक्सिमलिज्म’ भी कहा जा रहा है.
अस्सी के दौर के एंटरटेनमेंट, फैशन और गाने की बात करें तो इनमें भरपूर मनोरंजन नजर आता है. आज की तरह तब सोशल मीडिया नहीं था. लेकिन फिल्मी फैशन महानगर से दूर दराज के गांवों तक पहुंचने में बहुत देरी नहीं लगती थी. बॉबी, जूली, शोले या नूरी छाप चौड़ी बेल्ट, क्रांति छाप पटाखे, सुहाग छाप चूड़ी-बिंदी और तोहफा छाप साड़ियां बाजार में जबरदस्त सेलेबल थीं. बाजार में तब इनकी खूब डिमांड थी. और ये सबकुछ फिल्मी फीवर का प्रभाव था.
हेयर स्टाइल और बेल बॉटम
अस्सी के दशक के कलाकारों की हेयर स्टाइल सबसे अधिक चलन में रही. गोल्डेन पीरियड के सिनेमा के दौर में पुरुषों ने देव आनंद और जॉय मुखर्जी छाप हेयर स्टाइल खूब अपनाई तो महिलाओं ने साधना और मुमताज की स्टाइल की कॉपी की. लेकिन आगे चलकर राजेश खन्ना और ज़ीनत अमान और रेखा आदि ने फैशन सिंबल बदल दिये. जबकि अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना के युग में तो बेल बॉटम की आंधी आ गई. बेल बॉटम ने पोशाकों के सारे प्रतिमान बदल दिये.
अमिताभ बच्चन, विनोद खन्ना, जितेंद्र, मिथुन चक्रवर्ती और ऋषि कपूर के अलावा उस युग के सारे कलाकार, चाहें वह हीरो हों या हीरोइनें- सभी ने बेल बॉटम को बेधड़क अपनाया. हेमा मालिनी, रीना रॉय, परबीन बॉबी, नीतू सिंह, रेखा, रंजीता वगैरह सभी चौड़ी बेल्ट, हैट, बड़े फ्रेम के काले चश्मे और बेल बॉटम में सजी धजी दिखीं. भारतीय मनोरंजन और फैशन के इतिहास में पोशाक के लिहाज से यह सबसे भड़कीला कालखंड माना जाता है.
डिस्को म्यूजिक का आकर्षण
पोशाकों के अलावा अस्सी का दशक डिस्को म्यूजिक और नये पार्श्व गायकों के लिए भी खूब जाना जाता है. डिस्को डांसर की कामयाबी ने बेल बॉटम के फैशन को आउटडेटेड बना दिया. मिथुन चक्रवर्ती उस दौर के सबसे पहले सौ करोड़ी स्टार कहलाए. डिस्को डांसर में उनकी ड्रेस डिजाइनिंग और बप्पी लाहिड़ी के म्यूजिक ने अस्सी के दशक के युवाओं को झूमने पर मजबूर कर दिया. डिस्को डांसर ने भारत के बाद रूस और चीन तक के बाजार में खूब कलेक्शन किया था. डिस्को डांसर की यादें कभी जाती नहीं.
आयम अ डिस्को डांसर… या जिमी जिमी… गानों से बप्पी लाहिड़ी का सितारा रातों-रात बुलंद हो गया. हर तीसरी फिल्म में बप्पी लाहिड़ी का डिस्को म्यूजिक आने लगा. तब इसका प्रभाव भोजपुरी फिल्मों पर भी पड़ा. आज भी धुरंधर जैसी फिल्मों में जब अस्सी के दशक के डिस्को गाने का रीमिक्स इस्तेमाल किया जाता है तो उसकी मस्ती और सुरूर का अनुमान लगाया जा सकता है. डिस्को का असर ऐसा कि अमिताभ बच्चन की फिल्म खुद्दार में विनोद मेहरा पर एक गाना ही डिस्को 82… रचा गया. रंभा हो हो… गाने वाली उषा उथुप भी अस्सी के दशक में ही उभरीं.
नए गायक कलाकार भी आए
अस्सी का दशक नए गायक और गायिकाओं के आगमन के लिए भी जाना जाता है. मो. रफी की आवाज का विकल्प तेजी से खोजा गया- और इसी खोजी अभियान में अनवर, सुरेश वाडेकर, शब्बीर कुमार और मुन्ना अजीज जैसे नए गायक सामने आए तो किशोर कुमार के विकल्प के तौर पर अभिजीत और फिर बाद में कुमार शानू आदि. इससे पहले मुकेश के विकल्प के तौर उनके बेटे नितिन मुकेश, शैलेंद्र सिंह, मनहर उधास आदि को आजमाया जा चुका था. हालांकि ये तीनों आइकॉनिक गायकों जैसा प्रभाव पैदा कर पाने में बहुत सफल नहीं हुए लेकिन अस्सी के दशक की पहचान कहलाते हैं. तो गायिकाओं में साधना सरगम, अलका याज्ञनिक आदि भी सामने आईं.
तनाव मुक्त मनोरंजन का दौर
लेकिन इन सबके अलावा अस्सी के दशक के एंटरटेनमेंट, फैशन और गाने की सबसे बड़ी बात तो ये है कि इस दौर का मनोरंजन एकदम तनाव मुक्त था. यह भाव ही इस दौर को बाकी दौर से एकदम अलग बनाता है. कहानी, गाने, संगीत और जीवन शैली सब कुछ बिंदास. वास्तव में नब्बे के दौर में मु्क्त बाजार और उदारीकरण की आहट अस्सी के दौर में ही आ गई थी. आज जब हम अस्सी के दशक के फैशन को याद कर रहे हैं तो उस आहट को महसूस कर सकते हैं और उस बिंदास भाव को भी.
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संजीव श्रीवास्तव
संजीव श्रीवास्तव का पैतृक गांव-घर बिहार के सीतामढ़ी में है लेकिन पिछले करीब ढाई दशक से दिल्ली से लेकर मुंबई तक मीडिया की मुख्यधारा में सक्रिय हैं. ब्रेकिंग न्यूज़ से लेकर क्रिएटिव राइटिंग तक का हुनर रखते हैं, देश-विदेश की राजनीति, फिल्म, लिटरेचर, क्राइम जैसे विषयों पर बेबाकी से लिखते हैं. आसानी से समझ आने वाली और सोचने-विचारने वाली भाषा लिखना पसंद है. सिनेमा प्रिय विषय है- लिहाजा फिल्मों पर अब तक तीन किताबें, दो उपन्यास और कुछ पटकथा-संवाद भी लिख चुके हैं. कुछेक प्रिंट मीडिया में सब एडिटरी के बाद साल 2000 से टीवी न्यूज़ की दुनिया में प्रवेश. सबसे पहले जैन टीवी फिर सहारा समय में करीब 14 साल गुजारा, जहां प्राइम टाइम स्पेशल शोज/प्रोग्राम बनाने से लेकर मुंबई की एंटरटेंमेंट फील्ड में रिपोर्टिंग तक की. उसके बाद सूर्या समाचार, एबीपी न्यूज़ और न्यूज़ इंडिया के आउटपुट होते हुए अब डिजिटल मीडिया में TV9 से सम्बद्ध.
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