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बलूचिस्तान ने 11 अगस्त 2026 को अपना स्वतंत्रता दिवस घोषित कर दिया है। जानिए क्या सिर्फ आजादी की घोषणा करने भर से ही नया देश बन सकता है? ताइवान-बांग्लादेश के उदाहरण अंतरराष्ट्रीय मान्यता की राह को कैसे समझाते हैं।
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बलूचिस्तान को अलग देश की मान्यता में कितनी अड़चनें? (AI Image)
16 दिसंबर 1971 का दिन था, जब हमारे पड़ोस में एक नए राष्ट्र का जन्म हुआ था। पाकिस्तान से अलग हुए उस देश को नाम मिला बांग्लादेश। हालांकि, पाकिस्तानी सेना के ऑपरेशन सर्चलाइट के बाद बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान ने 26 मार्च 1971 को ही स्वतंत्रता घोषित कर दी थी और आज भी बांग्लादेश इसी दिन को स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाता है। लंबे संघर्ष के बाद 16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश, पाकिस्तान से आजाद हुआ, इसी दिन पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया था, इसीलिए 16 दिसंबर को विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है। एक बार फिर हमारे पड़ोस में एक और नया राष्ट्र अंगड़ाई लेने की तैयारी कर रहा है। मजेदार बात ये है कि यह नया देश भी पाकिस्तान से ही अलग हो सकता है, जिसका नाम बलूचिस्तान है। बलूचिस्तान में आजादी की आग 1947 से ही धधक रही है। पाकिस्तान का सबसे बड़ा हिस्सा होने के बावजूद Balochistan दशकों से अलग-थलग पड़ा है। अब द रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने अपना आंदोलन तेज कर दिया है। यही नहीं, उन्होंने अपने स्वतंत्रता दिवस की तारीख भी घोषित कर दी है। बलोच प्रतिनिधि मीर यार बलोच ने लोगों से 11 अगस्त 2026 को बलूचिस्तान का स्वतंत्रता दिवस मनाने की अपील की है। यही नहीं, उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी बलूचिस्तान को एक अलग संप्रभु राष्ट्र के रूप में मान्यता देने की अपील की है। चलिए जानते हैं किसी नए देश को मान्यता देने की प्रक्रिया क्या है? संयुक्त राष्ट्र की मान्यता कैसे मिलती है? बांग्लादेश और ताइवान के उदाहरणों से समझेंगे कि अलग बलूचिस्तान राष्ट्र के लिए अभी यहां के लोगों को कितनी लड़ाई लड़नी होगी।
द रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान ने एक बयान जारी किया है। इस बयान में दुनियाभर में रह रहे बलोच समुदाय से 11 अगस्त को राष्ट्रीय एकता और एकजुटता का प्रदर्शन के रूप में मनाने की अपील की गई है। मीर यार बलोच ने बलूचिस्तान और दुनियाभर में रहने वाले समुदाय के लोगों से अपने घरों, बाजारों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य सार्वजनिक स्थानों पर स्वतंत्र बलूचिस्तान का झंडा फहराने का आह्वान किया है।
हालांकि, यह भी सच है कि आज की आधुनिक दुनिया में नया देश बनाने के लिए सिर्फ स्वतंत्रता की घोषणा करना हा काफी नहीं है। इसके लिए कानूनी, राजनीतिक और कूटनीतिक शर्तें पूरी करनी होती हैं। एक संप्रभु राज्य बनने के लिए कानूनी मानदंडों के साथ अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मान्यता भी जरूरी है।
अलग देश का दर्जा : मोंटेवीडियो क्राइटेरिया
साल 1933 के मोंटेवीडियो कन्वेंशन के अनुसार संप्रभु राज्य बनने के लिए चार प्रमुख शर्तें जरूरी हैं। पहली, वहां स्थायी आबादी होनी चाहिए। दूसरी, उसका निश्चित भू-भाग होना चाहिए, भले सीमाओं पर विवाद हो। तीसरी, प्रभावी और स्वतंत्र सरकार का अस्तित्व जरूरी है। चौथी, वह अन्य देशों के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने में सक्षम हो। हालांकि, इन शर्तों को पूरा करने मात्र से ही वैश्विक स्तर पर वैधता या मान्यता की गारंटी नहीं मिल जाती।
द्विपक्षीय और संयुक्त राष्ट्र की मान्यता अहम
मोंटेवीडियो मानदंड पूरे करने के बावजूद किसी नए देश को पूर्ण संप्रभु राष्ट्र का दर्जा तभी मिलता है, जब दूसरे देश भी उसे मान्यता दें। यह मान्यता द्विपक्षीय या संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के जरिए बहुपक्षीय हो सकती है। इन मान्यताओं के अभाव में संधियां करना, वैश्विक संस्थाओं में शामिल होना, दूतावास खोलना और अंतरराष्ट्रीय मदद व व्यापार नेटवर्क तक पहुंच मुश्किल हो सकती है। Bangladesh को 26 मार्च 1971 में स्वतंत्रता घोषित करने और 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान से मुक्त होने के बाद धीरे-धीरे अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली थी। भारत पहला देश था, जिसने बांग्लादेश को मान्यता दी। संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता मिलते-मिलते 1974 आ गया था। हालांकि, बलूचिस्तान को उम्मीद होगी कि उसे मान्यता देने वाले शुरुआती देशों में भारत भी एक होगा।
ताइवान का उदाहरण भी जान लें
इस मामले में ताइवान एक अनोखा उदाहरण है। यह मोंटेवीडियो के चारों मानदंडों को पूरा करता है। यहां 2.3 करोड़ से ज्यादा आबादी बसती है। लोकतांत्रिक तौर पर चुनी हुई सरकार है। ताइवान की अपनी सेना और अर्थव्यवस्था है। इस देश के सीमित राजनयिक संबंध भी हैं। हालांकि, चीन के विरोध और ताइवान को अपना क्षेत्र मानने के दावे के चलते आज भी ताइवान संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं बन पाया है। यही कारण है कि ताइवान को अलग देश के रूप में आधिकारिक मान्यता देने वाले देशों की संख्या भी काफी सीमित है। इसके बावजूद भी ताइवान व्यवहारिक रूप से एक स्वतंत्र राष्ट्र की तरह है।
ऐसा ही हाल कोसोवो का भी है, जिसने साल 2008 में सर्बिया से आजादी घोषित कर दी थी। कोसोवो को अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के ज्यादातर राष्ट्रों सहित 100 से ज्यादा देशों ने मान्यता दी है। इसके बावजूद वह आज भी संयुक्त राष्ट्र का सदस्य नहीं बन पाया है, क्योंकि UN सिक्योरिटी काउंसिल के दो स्थायी सदस्य रूस और चीन ने अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल करते हुए कोसोवो को मान्यता को रोका हुआ है।
ताइवान और कोसोवो जैसे और भी देश हैं
दुनिया में कई ऐसे क्षेत्र हैं जिन्होंने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा तो कर दी, लेकिन उन्हें व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता अभी तक नहीं मिली है। इजरायल जैसे शक्तिशाली देश को भी 193 में से 163 देशों ने ही मान्यता दी है। अरब लीग के 15 देशों के साथ ही 11 अन्य मुस्लिम बहुल देश और क्यूबा, उत्तरी कोरिया व वेनेजुएला ने उसे मान्यता नहीं दी है। फिलिस्तीन को 135 से ज्यादा देशों की मान्यता प्राप्त है और संयुक्त राष्ट्र में नॉन-मेम्बर ऑब्जर्वर का दर्जा है, लेकिन पूर्ण सदस्यता अभी तक नहीं मिली। दक्षिण ओसेशिया और अबखाजिया को रूस सहित कुछ देशों ने मान्यता दी है। उत्तरी साइप्रस को अभी सिर्फ तुर्की से मान्यता मिली है। सोमालीलैंड ने साल 1991 में सोमालिया से स्वतंत्रता की घोषणा की, लेकिन उसे अभी तक संयुक्त राष्ट्र की मान्यता नहीं मिली।
किसी नए देश को संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता कैसे मिलती है?
किसी भी नए देश के लिए संयुक्त राष्ट्र (UN) की सदस्यता अंतरराष्ट्रीय मान्यता की दिशा में बड़ा कदम होता है। अगर बलूचिस्तान को अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता हासिल करनी है तो उनसे संयुक्त राष्ट्र से मान्यता मिलना जरूरी है। इसके लिए दो चरण जरूरी हैं। पहले सुरक्षा परिषद में कम से कम 9 सदस्यों का समर्थन चाहिए और पांच स्थायी सदस्यों (अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन) में से किसी का वीटो नहीं होना चाहिए। मंजूरी मिलने के बाद प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में जाता है, जहां 193 सदस्य देशों में से दो-तिहाई बहुमत जरूरी है। दोनों चरण पार करने के बाद ही किसी देश को पूर्ण सदस्यता मिलती है। यहां बलूचिस्तान के लिए समस्या ये है कि चीन स्थायी सदस्य है और वह पाकिस्तान का पुराना दोस्त है। ऐसे में चीन की तरफ से वीटो आना तय है।

बलूचिस्तान को अलग राष्ट्र की मान्यता के लिए करना पड़ेगा लंबा इंतजार!
दुनिया का सबसे नया मान्यता प्राप्त देश
बलूचिस्तान के लिए उम्मीद की किरण के रूप में साउथ सूडान नाम का एक देश है। साउथ सूडान संयुक्त राष्ट्र का सबसे नया और 193वां देश है। यह देश 9 जुलाई 2011 को सूडान से आजाद हुआ और 14 जुलाई 2011 को इसे संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बना दिया गया। साउथ सूडान की दुनियाभर के देशों ने तेजी से मान्यता दी और सिक्योरिटी काउंसिल व जनरल असेंबली से भी किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई। लेकिन बलूचिस्तान के लिए राह में कांटे ही कांटे हैं।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि अलग आजाद देश घोषित करना आसान है। लेकिन सिर्फ घोषणा से अलग देश की मान्यता नहीं मिल जाती है। किसी देश को अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता मिलने के लिए एक लंबी राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ती है, जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर लड़ी जाती है। इसमें भी अलग-अलग देशों के अपने हित होते हैं, जिसके आधार पर वह फैसला लेते हैं।