CG High Court: महिला 7 महीने से जेल में, FIR लिखने वाला ASI ही बना जांच अधिकारी, नशीली टैबलेट के केस में हाईकोर्ट सख्त

Published on 22 अग॰ 2026

CG High Court: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने बिलासपुर के सरकंडा थाना क्षेत्र में एनडीपीएस एक्ट के तहत हुई कार्रवाई और जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। मामला एक महिला के घर से कथित तौर पर 2925 क्लोनाजेपाम (रिवोट्रिल) टैबलेट बरामद होने से जुड़ा है। पुलिस ने महिला के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज कर उसे जेल भेज दिया था। महिला करीब सात महीने से जेल में बंद है।

मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सबसे अहम सवाल यह उठाया कि जिस एएसआई ने मामले में एफआईआर दर्ज कराई, उसी अधिकारी को जांच की जिम्मेदारी कैसे दी गई। कोर्ट ने इस मामले में डीजीपी से एफिडेविट के साथ जवाब मांगा है।

महिला के घर से 2925 टैबलेट मिलने का दावा

सरकंडा थाना क्षेत्र के बंधवापारा में पुलिस ने एक महिला के घर दबिश देकर 2925 क्लोनाजेपाम टैबलेट बरामद करने का दावा किया था। पुलिस ने इन दवाओं को प्रतिबंधित और नशीला पदार्थ बताते हुए महिला के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट के तहत केस दर्ज किया।

इसके बाद महिला को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया। परिवार का कहना है कि महिला करीब सात महीने से जेल में है और इस वजह से उसकी बच्ची और परिवार को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

परिवार ने पुलिस पर लगाया फंसाने का आरोप

महिला के भाई ने आरोप लगाया है कि उसकी बहन को सरकंडा पुलिस और उसके बहनोई रामकिशोर ने कथित तौर पर साजिश के तहत फंसाया है। उसने मामले में एएसआई शैलेंद्र सिंह की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।

हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यही वजह है कि मामले में कोर्ट के सामने रखे गए दावों और पुलिस की जांच प्रक्रिया की अब न्यायिक स्तर पर भी जांच हो रही है।

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छत पर मिला था दवाओं से भरा बैग

याचिकाकर्ताओं की ओर से कोर्ट में बताया गया कि कथित प्रतिबंधित दवाओं से भरा पॉलिथीन बैग महिला के पास से सीधे बरामद नहीं हुआ था।

परिवार का दावा है कि करीब 14 साल के बच्चे को पतंग उड़ाते समय यह बैग घर की छत पर मिला था। बच्चे ने मोबाइल से दवाओं के बारे में जानकारी जुटाई और इसकी जानकारी अपनी मां को दी।

परिवार के मुताबिक, बैग को अनचाही वस्तु समझकर सीढ़ियों के पास कचरे की तरह रख दिया गया था। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए महिला को आरोपी बना दिया।

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बच्चे को 10 घंटे थाने में बैठाने का आरोप

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में यह भी आरोप लगाया कि करीब 14 साल के बच्चे के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं थी। इसके बावजूद पुलिस उसे थाने ले गई और करीब 10 घंटे तक थाने में बैठाकर रखा।

परिवार ने इस पूरी कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है। साथ ही बच्चे के मोबाइल को फोरेंसिक जांच के लिए लेने की मांग भी की गई है।

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हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी पर उठाया सवाल

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच प्रक्रिया पर खास आपत्ति जताई। कोर्ट के सामने बताया गया कि एएसआई शैलेंद्र सिंह ने कथित तौर पर देहाती नालिश दर्ज की और उसी के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई।

इसके बाद उसी अधिकारी को मामले का जांच अधिकारी बना दिया गया। कोर्ट को यह भी बताया गया कि जांच पूरी करने के बाद इसी अधिकारी ने महिला के खिलाफ चार्जशीट भी पेश की। यही प्रक्रिया हाईकोर्ट के सवालों के घेरे में आ गई है। कोर्ट ने डीजीपी से इस पूरे मामले पर शपथपत्र के जरिए जवाब मांगा है।

एएसआई के पुराने रिकॉर्ड की भी जानकारी मांगी

हाईकोर्ट ने डीजीपी को जांच अधिकारी एएसआई शैलेंद्र सिंह के पिछले आचरण और रिकॉर्ड की जानकारी भी पेश करने का निर्देश दिया है। कोर्ट के इस निर्देश के बाद अब यह भी देखा जाएगा कि संबंधित अधिकारी का पिछला रिकॉर्ड क्या रहा है और इस मामले की जांच उन्हें सौंपने की प्रक्रिया कैसे तय हुई।

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24 अगस्त को होगी अगली सुनवाई

फिलहाल हाईकोर्ट ने मामले में डीजीपी से एफिडेविट मांगा है। अगली सुनवाई 24 अगस्त को होगी। डीजीपी के शपथपत्र के बाद कोर्ट मामले की जांच प्रक्रिया और पुलिस की भूमिका को लेकर आगे का रुख तय करेगा।

इस मामले में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि एफआईआर दर्ज करने वाले अधिकारी को ही जांच की जिम्मेदारी क्यों दी गई और क्या इससे जांच की निष्पक्षता प्रभावित हुई? इसका जवाब अब डीजीपी के एफिडेविट और अगली सुनवाई के बाद सामने आएगा।