व्यावसायिक प्रॉपर्टी के किराया विवाद पर कमर्शियल कोर्ट का अधिकार नहीं: HC

Published on 19 जुल॰ 2026

Ranchi: झारखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि किसी विशेष किराया नियंत्रण कानून के तहत बेदखली (Eviction) के मामलों की सुनवाई का अधिकार रेंट कंट्रोलर को दिया गया है, तो केवल इस आधार पर कि किराये की संपत्ति व्यापार एवं वाणिज्यिक गतिविधियों के लिए उपयोग हो रही है, कमर्शियल कोर्ट को ऐसे विवाद की सुनवाई का अधिकार नहीं मिल जाता. 

हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति आनंद सेन की एकलपीठ ने कहा कि झारखंड बिल्डिंग (लीज, रेंट एंड एविक्शन) कंट्रोल एक्ट, 2011 की व्यवस्था से यह स्पष्ट है कि बेदखली संबंधी मामलों में सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र निहित रूप से समाप्त हो जाता है. ऐसे में कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 की धारा 11 के अनुसार कमर्शियल कोर्ट भी ऐसे मामलों की सुनवाई नहीं कर सकती.

इसे भी पढ़ें: 

Ranchi News: अधिकारियों के रवैये पर वित्त मंत्री नाराज, बोले- ‘जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं’
Ranchi News: मानसून में हर आपदा से निपटने को तैयार है NDRF 9वीं बटालियन

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए रेंट कंट्रोलर को निर्देश दिया कि वह अनावश्यक स्थगन दिए बिना बेदखली वाद का शीघ्र निस्तारण करे. प्रतिवादी की ओर से अधिवक्ता अमृतांश वत्स ने पक्ष रखा. 

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि किसी मामले में सिविल कोर्ट का अधिकार क्षेत्र कानून द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रतिबंधित है, तो कमर्शियल कोर्ट भी उस विवाद की सुनवाई नहीं कर सकती, भले ही संबंधित अचल संपत्ति का उपयोग पूरी तरह व्यापार और वाणिज्य के लिए किया जा रहा हो.

दरअसल, देवानंद सिंह एंड सन एचयूएफ ने वर्ष 2023 में धनबाद के रेंट कंट्रोलर-सह-अनुमंडल पदाधिकारी (एसडीओ) के समक्ष आदित्य बिड़ला लाइफस्टाइल ब्रांड्स लिमिटेड के खिलाफ बेदखली की कार्यवाही शुरू की थी.

कंपनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा कि विवादित परिसर पूरी तरह व्यावसायिक उपयोग में है और विवाद की कीमत 43 लाख रुपये से अधिक है. इसलिए यह कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट के तहत "कमर्शियल डिस्प्यूट" है, जिसकी सुनवाई केवल कमर्शियल कोर्ट में होनी चाहिए.

कंपनी ने यह भी दलील दी कि वह अब परिसर के कब्जे में नहीं है और फ्रेंचाइजी समझौता समाप्त होने के बावजूद उसका फ्रेंचाइजी परिसर में बना हुआ है. इसलिए रेंट कंट्रोलर को मामले की सुनवाई का अधिकार नहीं है.

हाईकोर्ट ने कहा कि 2011 के झारखंड किराया कानून ने पुराने कानून को निरस्त कर बेदखली मामलों का अधिकार रेंट कंट्रोलर को सौंप दिया है. भले ही अधिनियम में सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर स्पष्ट रोक नहीं है, लेकिन कानून की पूरी संरचना से यह रोक निहित रूप से स्पष्ट होती है.

कोर्ट ने यह भी कहा कि कंपनी वास्तव में कब्जे में है या नहीं तथा फ्रेंचाइजी का कब्जा कंपनी का रचनात्मक (Constructive) कब्जा माना जाएगा या नहीं, यह तथ्यात्मक विवाद है, जिसका निर्णय केवल साक्ष्यों के आधार पर रेंट कंट्रोलर करेगा.

साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रेंट कंट्रोलर द्वारा पहले की गई टिप्पणियां केवल प्रथमदृष्टया (Prima Facie) थीं और अंतिम निर्णय को प्रभावित नहीं करेंगी.

हाईकोर्ट ने यह तर्क भी अस्वीकार कर दिया कि यदि रेंट कंट्रोलर किसी एक राहत को देने में सक्षम नहीं है तो पूरी बेदखली कार्यवाही ही अमान्य हो जाएगी. अदालत ने कहा कि किसी एक राहत पर अधिकार न होने से पूरी कार्यवाही समाप्त नहीं हो जाती.

Lagatar Media की यह खबर आपको कैसी लगी. नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में अपनी राय साझा करें.