Updated: Wednesday, July 22, 2026, 18:39 [IST]
NEET Paper Leak को लेकर सड़क से संसद तक महासंग्राम छिड़ा है। पार्लियामेंट के मॉनसून सत्र के पहले दो दिन नीट की आंच की भेंट चढ़ चुके हैं और तीसरे दिन जहां सरकार बैकफुट पर नजर आ रही है। वहीं, विपक्ष का पारा हाई है। अब कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और राज्यसभा में पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने संसद में 'नियम 267' के तहत चर्चा की मांग की है।
आइए जानते हैं नियम 267 क्या है? विपक्ष क्यों कर रहा है इसी के तहत चर्चा की मांग? सरकार क्यों भाग रही है? इससे पहले एक नजर डालते हैं इस पूरे हंगामे की वजह पर…
देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET-UG में पेपर लीक और सरकारी परीक्षाओं में संस्थागत धांधली के मुद्दे ने देश की राजनीति में भूचाल ला दिया है। 6 जून 2026 से दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का प्रोटेस्ट मॉनसून सत्र शुरू (20 जुलाई) होते ही मुखर और धारदार हो जाता है। 20 जुलाई को CJP के 'संसद चलो' मार्च में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव (मैनपुरी से सांसद ), आजमगढ़ सांसद धर्मेंद्र यादव, मछलीनगर से सांसद प्रिया सरोज, कैराना से सांसद इकरा हसन, आप नेता मनीष सिसोदिया, आतिशी और आप राज्यसभा सांसद संजय सिंह, राज्यसभा की पूर्व सदस्य वृंदा करात (Brinda Karat) समेत एकीकृत विपक्ष अगले मोर्चे से लोहा लेता दिखा था।
इसने सरकार की नींदे उड़ा दी थी और फिर अगले दिन यानी 21 जुलाई को प्रधानमंत्री आवास (7, लोक कल्याण मार्ग) के बाहर कांग्रेस नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष के धरना-प्रदर्शन ने बची-कुची कसर भी पूरी कर दी। इस मामले में शुरू से ही गलतियां कर रहा सत्ता पक्ष राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव जैसे नेताओं को बलपूर्वक उठाकर सरकार का दमनकारी पक्ष जनता के सामने उजागर कर दिया। एक तरफ जहां दिल्ली की सड़कों पर पुलिस और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच तीखी झड़पें हो रही हैं, वहीं दूसरी तरफ राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने संसदीय नियमावली के सबसे शक्तिशाली 'नियम 267' का पासा फेंककर सरकार को पूरी तरह से बैकफुट पर धकेल दिया है।
क्या है 'नियम 267'? इसी पर क्यों अड़ा विपक्ष?
राज्यसभा की कार्यसंचालन नियमावली (Rules of Procedure and Conduct of Business in the Council of States) का नियम 267 विपक्ष का एक ऐसा अस्त्र है, जो सामान्य परिस्थितियों में बेहद कम इस्तेमाल होता है। दरअसल, नियम 267 राज्यसभा का एक विशेष अधिकार देता है, जिसके तहत संसद के उच्च सदन में पूर्व-निर्धारित सभी संसदीय कार्यों, यहां तक कि प्रश्नकाल और शून्यकाल को भी रोककर आपातकालीन या वांछित मुद्दे पर चर्चा कराने का प्रावधान है।
कांग्रेस अध्यक्ष खरगे इसी नियम 267 के तहत नीट पेपर लीक, जो इस समय अति संवेदनशील और महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दे का रूप ले चुक है, पर तत्काल चर्चा की मांग कर रहे हैं। विपक्ष इसके जरिए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) के पुनर्गठन और 24 लाख अभ्यर्थियों के भविष्य पर सरकार की सीधी जवाबदेही तय करने की मांग कर रहा है। संसदीय कार्यमंत्री किरन रिजिजू भी कह रहे हैं कि सरकार नीट पेपर लीक पर चर्चा के लिए तैयार है, तो फिर पेंच कहां फंस रहा है? पेंच फंस रहा है नियम 267 पर।
कांग्रेस और विपक्ष चाहते हैं कि चर्चा इसी नियम के अंतर्गत हो। इससे यह होगा कि दिन के लिए राज्यसभा में सूचित सभी विधेयक, बिल, चर्चा-परिचर्चा सब साइड हो जाएंगे। शून्यकाल और प्रश्नकाल भी अप्रभावी होंगे। चर्चा केवल इसी पर होगी और अगर हो-हल्ला की वजह से चर्चा रुकी तो फिर से इसी से शुरू होगी। विपक्ष खासकर को इसका पहला लाभ यह नज़र आता है कि वो देश भर में एक संदेश दे सकेंगे कि कांग्रेस देश के छात्र और युवाओं के साथ है और यह कि उन्होंने संसद में नीट की चर्चा को बाकी सारे कार्यों से ऊपर रखा। दूसरा यह कि सरकार को कोसने का बेरोकटोक मौका मिल जाएगा।
नियम 267 की 3 मुख्य विशेषताएं:-
- 1. सामान्य कार्यवाही का निलंबन: अगर, सभापति नियम 267 के तहत दिए गए नोटिस को स्वीकार कर लेते हैं, तो उस दिन के लिए सूचीबद्ध सभी कार्य, जैसे प्रश्नकाल (Question Hour), शून्यकाल (Zero Hour) और सरकारी विधेयकों पर चर्चा, तुरंत टाल दी जाती हैं।
- 2. सभापति का विशेषाधिकार: इस नियम के तहत नोटिस को स्वीकार करना या खारिज करना पूरी तरह से राज्यसभा के सभापति (उपराष्ट्रपति) का विवेकाधिकार होता है।
- 3. दुर्लभ से दुर्लभतम प्रयोग: संसदीय परंपराओं के अनुसार, इस नियम का प्रयोग केवल उन्हीं परिस्थितियों में होता है जब देश के सामने कोई अभूतपूर्व और तत्काल राष्ट्रीय संकट खड़ा हो गया हो।
नियम 267 से सरकार क्यों भाग रही है?
अगर, संख्या बल को देखा जाए, तो हलिया दल-बदल के बाद राज्यसभा में भी सत्ता पक्ष कमजोर नहीं है और सरकार इस पर चर्चा की हामी भी भर रही है। लेकिन नियम 267 से क्यों भाग रही है? नियम 267 का सीधा मतलब है कि संबंधित मुद्दे को पहली प्राथमिकता देना। सरकार यह तो मानती है कि नीट पेपर लीक भी एक मुद्दा है लेकिन यह नहीं मानना चाहती कि यही सबसे बड़ा मुद्दा है।
दूसरा कारण यह भी है कि 267 के तहत चर्चा का मतलब है कि अन्य बिल अभी टेबल नहीं हो सकेंगे। सरकार की कोशिश रहती है कि शोर-शराबे के बीच अपनी संख्याबल के सहारे बिल पास करा ले जाए। तीसरा कारण सब कुछ ताख पर रखकर केवल नीट पेपर लीक जिस पर सरकार की सफाई से देश इस वक्त संतुष्ट नहीं हो सकता, उस मामले पर विपक्ष को स्कोर करने दे।
लोकसभा में चर्चा को तैयार सरकार
अब सवाल यह उठता है कि जो सरकार लोकसभा में प्राथमिकता के आधार पर चर्चा के लिए तैयार है, वो राज्यसभा में खरगे से कन्नी क्यों काट रहे हैं? इसका जवाब है- 'संवैधानिक प्रावधान'। दरअसल, 'नियम 267' केवल राज्यसभा में प्रभावी होता है। संसद के निचले सदन में इसकी कोई व्यवस्था नहीं है, ना ही ऐसा कोई समतुल्य नियम है। वैसे लोकसभा में 'प्रिविलेज मोशन' या 'विशेषाधिकार प्रस्ताव' होता है, जिस पर कोई भी सांसद चर्चा की मांग कर सकता है, लेकिन उसमें अन्य सूचित कार्य को साइड रखने की बाध्यता नहीं होती। सत्ता पक्ष को इसका यह लाभ होता है कि जैसे ही हंगामा होता है, सदन को स्थगित कर दिया जाता है या इसी हंगामे के बीच अन्य सूचित प्रस्ताव पर चर्चा या मतविभाजन करवा दिया जाता है।
राज्यसभा में खरगे तो लोकसभा में गरजे अखिलेश, कहा- बेटियों के कपड़े फाड़ेंगे आप?
राज्यसभा में विपक्ष की कमान जहां कांग्रेस अध्यक्ष ने थाम रखी है, वहीं लोकसभा में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने भी सरकार की बखिया उधेड़ कर रख दी। निम्न सदन में सपा सुप्रीमो स्पीकर ओम बिरला से भिड़ गए और उन्हें जमकर सुनाया। लोकसभा में नीट पर नहीं बोलने देने से नाराज अखिलेश ने लोकसभा अध्यक्ष को चेतावनी देते हुए कहा कि यह मुद्दा बीजेपी और कांग्रेस का नहीं बल्कि देश के युवा, छात्र, नौजवानों का है। उन्होंने यह लोकसभा स्पीकर को सुनाते हुए यह भी कहा कि मंत्री का इस्तीफा तो क्या है... कभी भी ले लेंगे, लेकिन जो छात्रों की हड्डियां तोड़ी, सर फोड़े... बेटियों के कपड़े फाड़ेंगे आप?
हंगामा क्यों बरपा है?
सड़क से संसद तक विपक्ष धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर अड़ा है। यह कोई पहला मौका नहीं है जब NEET-UG जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर धांधली, संदिग्ध ग्रेस मार्क्स और पेपर लीक के आरोपों ने देश के लाखों अभ्यर्थियों और उनके परिवारों के सपनों पर पानी फेर दिया है। विपक्षी दलों ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की साख और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे 'संस्थागत नाकामी' करार दिया है। सीजेपी समेत विपक्षी सांसदों और छात्र संगठनों का सीधा आरोप है कि शिक्षा मंत्रालय अपनी जिम्मेदारियों से भाग रहा है। इसी के तहत शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के तुरंत इस्तीफे और NTA के व्यापक पुनर्गठन की मांग उठाई गई है।
जंतर-मंतर से संसद तक: हर तरफ हल्ला बोल
सदन के भीतर गतिरोध से पहले इसकी तपिश दिल्ली की सड़कों पर साफ दिखाई दी। विभिन्न छात्र मोर्चों, युवा संगठनों और सीजेपी (CJP) ने जंतर-मंतर पर विशाल विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया। जब प्रदर्शनकारी छात्रों ने संसद भवन की ओर मार्च करने की कोशिश की, तो पुलिस ने बैरिकेडिंग लगाकर उन्हें रोक दिया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार पुलिस बल का इस्तेमाल करके युवाओं की लोकतांत्रिक आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है, जिसने आग में घी का काम किया और संसद के दोनों सदनों में गतिरोध चरम पर पहुंच गया।
युवाओं का भविष्य और संसदीय लोकतंत्र की परीक्षा
नीट विवाद अब सिर्फ एक प्रतियोगी परीक्षा में हुई गड़बड़ी का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह देश की प्रशासनिक पारदर्शिता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की परीक्षा बन चुका है। एक तरफ जहां 22 से 24 लाख युवा अपने भविष्य को लेकर अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं, वहीं संसद में नियम 267 को लेकर जारी यह खींचतान यह तय करेगी कि क्या देश का शीर्ष विधायी निकाय सड़क पर गूंज रही युवाओं की चीख को अपनी प्राथमिकता बना पाता है या नहीं।