नवभारत विशेष: केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के खिलाफ आंदोलन, इसे लेकर इतनी चिंताएं क्यों हैं?
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Written By:
अंकिता पटेल
Updated On: Aug 03, 2026 | 09:08 AM IST
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सार
Ken Betwa Link Project Protest: केन-बेतवा लिंक परियोजना के विरोध में छतरपुर के कुपी गांव में ग्रामीणों ने जल सत्याग्रह, भूख हड़ताल और प्रतीकात्मक फांसी जैसे आंदोलन किए।

केन-बेतवा लिंक परियोजना आंदोलन (सोर्स: नवभारत डिजाइन फोटो)
विस्तार
Ken Betwa Link Project: पहले सैंकड़ों लोग नदी में जल सत्याग्रह करते हुए खड़े हुए, फिर उन्होंने चिता आंदोलन व चूल्हा बंद आंदोलन किया और जब उस पर भी उचित प्रतिक्रिया नहीं मिली, तो उन्होंने प्रतीकात्मक फांसी के फंदे अपने गले में डाले। एक माह से अधिक तक चले इस आंदोलन ने भूमि अधिग्रहण विवाद को देश के सबसे प्रमुख विरोध प्रदर्शन में तब्दील कर दिया था।
प्रशासन ने यह कहते हुए कि नदी में निरंतर बढ़ते जल स्तर से प्रदर्शनकारियों के जीवन को खतरा है, आंदोलन को जबरन समाप्त करा दिया। यह विरोध प्रदर्शन छतरपुर जिले के कुपी गांव से गुजर रही बराना नदी में हो रहा था।
यहां सैंकड़ों ग्रामीण, जिनमें से अधिकांश आदिवासी थे, केंद्र सरकार के 44,000 करोड़ रुपये के केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट का विरोध कर रहे थे। मध्य प्रदेश पुलिस ने 19 जुलाई 2026 को जबरन आंदोलन स्थल से हटा दिया और जय किसान संगठन के संस्थापक अमित भटनागर को उठाकर सरकारी अस्पताल में भर्ती करा दिया। वह 14 दिन से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर थे।
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केन-बेतवा: आश्वासन के बाद आंदोलन स्थगित
पुलिस ने लगभग 150 प्रदर्शनकारियों को भी उठाया, जिनमें से ज्यादातर पास के पन्ना जिले से थे और उन्हें बस में भरकर उनके गांवों में छोड़ दिया। अमित भटनागर ने 23 जुलाई को अपना 18 दिन का अनशन सरकार के इस आश्वासन पर स्थगित कर दिया कि जो लोग पुनर्वास प्रक्रिया में छूट गए थे उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाएगा।
केंद्रीय सिंचाई मंत्रालय और केंद्रीय जल आयोग ने 1980 में नेशनल पर्सपेक्टिव प्लान (एनपीपी) का गठन किया था, जिसके तहत नदियों को जोड़ने के 30 प्रोजेक्ट्स प्रस्तावित हैं, जिनमें से पहला केन-बेतवा रिवर लिंकिंग प्रोजेक्ट है। एनपीपी का उद्देश्य यह है कि जिन नदियों में सरप्लस पानी है, उनका अतिरिक्त पानी उन नदियों में पहुंचा दिया जाए, जिनमें पानी की कमी है। इस प्रोजेक्ट से 103 मेगावाट हाइड्रोपावर और 27 मेगावाट सोलर पावर का उत्पादन भी हो सकेगा।
केन-बेतवा: पानी के साथ विस्थापन का सवाल
इसका मकसद अक्सर सूखे से पीड़ति रहने वाले बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की कमी को पूरा करना भी है यानी मध्य प्रदेश के 12 जिलों में 4.4 मिलियन लोगों को और उत्तर प्रदेश के 10 जिलों में 2 मिलियन से अधिक लोगों को पीने का पानी उपलब्ध हो सकेगा।
जब प्रोजेक्ट का उद्देश्य इतना अच्छा है तो आदिवासी इसका विरोध क्यों कर रहे हैं और उनकी मुख्य मांगें क्या हैं? केंद्र सरकार के अनुसार, छत्तरपुर जिले के 14 गांवों और पन्ना जिले के 8 गांवों के 7,193 परिवारों को इस प्रोजेक्ट के कारण विस्थापन का सामना करना पड़ रहा है। केन-बेतवा प्रोजेक्ट से संबंधित मुख्य मांगें, जय किसान संगठन के दिव्या अहिरवार के मुताबिक यह है कि 12.5 लाख रुपये के पुनर्वास पैकेज का लाभ हितग्राही परिवार को नहीं, बल्कि प्रत्येक वयस्क को दिया जाए।
केन-बेतवा: मुआवजा और पर्यावरण पर बढ़ी चिंता
मुआवजा बढ़ाकर 25 लाख रुपये किया जाए और योग्यता की कट-ऑफ-डेट 16 फरवरी 2024 से हटाकर वर्तमान तिथि की जाए। केन-बेतवा प्रोजेक्ट का बहुत बड़ा हिस्सा पन्ना टाइगर रिजर्व के अंदर आता है। बुनियादी चिंता पेड़ों को गिराने से भी संबंधित है।
जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार दौधन बांध और आसपास के इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए जगह बनाने हेतु लगभग 17,101 पेड़ों की पहचान की गई थी, जिन्हें गिराया जाना था। इनमें से रिजर्व वन के अंदर 12,404 पेड़ों को गिराया भी जा चुका है। इससे चिंता यह है कि रिजर्व वन में बाघों को फिर से लाना कठिन हो जाएगा, जहां 2009 में इनकी संख्या स्थानीय तौर पर लुप्त हो गई थी।
बाघों के अतिरिक्त अन्य प्रजातियों पर भी प्रभाव पड़ सकता है जैसे गिद्ध और केन घड़याल अभ्यारण्य में महसीर मछली व घड़यिाल। केंद्र सरकार ने अभी तक दोनों बेसिनों का हाइड्रोलॉजिकल डाटा यह दावा करते हुए जारी नहीं किया है कि अंतरराष्ट्रीय गंगा बेसिन के सबसेट होने के नाते यह संवेदनशील है।
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इसे लेकर इतनी चिंताएं क्यों हैं?
एक माह से अधिक तक चले इस आंदोलन ने भूमि अधिग्रहण विवाद को देश के सबसे प्रमुख विरोध प्रदर्शन में तब्दील कर दिया था। प्रशासन ने यह कहते हुए कि नदी में निरंतर बढ़ते जल स्तर से प्रदर्शनकारियों के जीवन को खतरा है, आंदोलन को जबरन समाप्त करा दिया। यह विरोध प्रदर्शन छतरपुर जिले के कुपी गांव से गुजर रही बराना नदी में हो रहा था।
लेख- नरेंद्र शर्मा के द्वारा
