बुलंदशहर जिले की शिकारपुर विधानसभा ग्रामीण बहुलता, कस्बाई बाजारों और सामाजिक विविधता वाली महत्वपूर्ण सीट है। Shikarpur Assembly Caste Equations में यादव, ब्राह्मण, अनुसूचित जाति, मुस्लिम, कुर्मी, ठाकुर और निषाद-मल्लाह मतदाताओं की भूमिका प्रमुख मानी जाती है। वर्ष 2026 की अंतिम मतदाता सूची के अनुसार शिकारपुर विधानसभा में कुल 3,05,172 मतदाता दर्ज हैं। इनमें 1,64,540 पुरुष, 1,40,629 महिला और तीन थर्ड जेंडर मतदाता शामिल हैं।
उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के जातिगत समीकरण / जातीय समीकरण और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ पर चुनावी परिणाम काफी हद तक निर्भर करता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों की मानें तो उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 एक ऐसा निर्णायक अवसर है जो राज्य की दीर्घकालिक राजनीतिक दिशा को स्पष्ट करेगा।
शिकारपुर विधानसभा पर वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। भाजपा के अनिल शर्मा ने वर्ष 2017 और 2022 में लगातार दो चुनाव जीते। वर्ष 2022 में उन्होंने राष्ट्रीय लोकदल के किरणपाल सिंह को 55,683 मतों के बड़े अंतर से हराया था। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को शिकारपुर विधानसभा खंड में कांग्रेस पर 45,681 मतों की बढ़त मिली। इन परिणामों के बावजूद यादव-मुस्लिम समीकरण, दलित वोटों की दिशा, ब्राह्मण समर्थन, भाजपा-रालोद तालमेल और बदली मतदाता सूची 2027 के चुनाव को प्रभावित करेगी।
शिकारपुर विधानसभा एक नजर में
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| विधानसभा क्षेत्र | शिकारपुर |
| विधानसभा संख्या | 69 |
| जिला | बुलंदशहर |
| लोकसभा क्षेत्र | बुलंदशहर |
| लोकसभा सीट का आरक्षण | अनुसूचित जाति |
| विधानसभा सीट की स्थिति | सामान्य |
| वर्तमान विधायक | अनिल शर्मा |
| वर्तमान विधायक की पार्टी | भारतीय जनता पार्टी |
| पहला विधानसभा चुनाव | 1957 |
| 2022 की जीत का अंतर | 55,683 वोट |
| 2026 कुल मतदाता | 3,05,172 |
| पुरुष मतदाता | 1,64,540 |
| महिला मतदाता | 1,40,629 |
| थर्ड जेंडर मतदाता | 3 |
| प्रमुख सामाजिक समूह | यादव, ब्राह्मण, दलित, मुस्लिम, कुर्मी और ठाकुर |
| क्षेत्रीय स्वरूप | ग्रामीण बहुल एवं अर्ध-शहरी |
| प्रमुख मुद्दे | पेयजल, जलभराव, सड़क, स्वास्थ्य, किसान आय और रोजगार |
शिकारपुर विधानसभा का विस्तार शिकारपुर तहसील और अनूपशहर तहसील के जहांगीराबाद क्षेत्र से जुड़े कतियावली इलाके तक है। वर्ष 2008 के परिसीमन के बाद इसे विधानसभा संख्या 69 दी गई। यह सीट 2008 से पहले अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी, लेकिन वर्तमान में सामान्य सीट है। शिकारपुर का पहला विधानसभा चुनाव 1957 में हुआ था, जबकि 1967 से 1973 के बीच यह सीट अस्तित्व में नहीं थी।
Shikarpur Assembly Caste Equations की सबसे महत्वपूर्ण धुरी यादव, ब्राह्मण, अनुसूचित जाति और मुस्लिम मतदाताओं के आसपास बनती है। पुराने सामाजिक आकलनों में यादव मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 18 से 22 प्रतिशत के बीच मानी गई है। ब्राह्मणों की महत्वपूर्ण मौजूदगी के साथ जाटव-चमार समाज का बड़ा आधार और मुस्लिम मतदाताओं का प्रभाव भी सीट की राजनीतिक दिशा तय करता है। कुर्मी मतदाता कुछ इलाकों में केंद्रित हैं, जबकि ठाकुरों की मध्यम और निषाद-मल्लाह समाज की क्षेत्रीय मौजूदगी मानी जाती है।
शिकारपुर विधानसभा का संकेतात्मक सामाजिक समीकरण
| सामाजिक समूह | पुराना संकेतात्मक प्रभाव | चुनावी भूमिका |
|---|---|---|
| यादव | करीब 18 से 22 प्रतिशत का पुराना अनुमान | समाजवादी पार्टी का प्रमुख आधार, किसान राजनीति में प्रभाव |
| ब्राह्मण | उल्लेखनीय मौजूदगी | भाजपा के मौजूदा सामाजिक आधार और प्रत्याशी की पहचान से जुड़ा |
| अनुसूचित जाति | बड़ा सामाजिक समूह | बसपा का पारंपरिक आधार, भाजपा और सपा के लिए स्विंग वोट |
| मुस्लिम | महत्वपूर्ण मौजूदगी | विपक्षी दलों के लिए अहम शुरुआती आधार |
| कुर्मी | कुछ क्षेत्रों में केंद्रित | गैर-यादव OBC राजनीति में महत्वपूर्ण |
| ठाकुर | मध्यम प्रभाव | भाजपा और स्थानीय प्रत्याशी आधारित मतदान में भूमिका |
| निषाद-मल्लाह | क्षेत्रीय रूप से केंद्रित | बूथ स्तर पर निर्णायक पिछड़ा समुदाय |
| वैश्य एवं व्यापारी | कस्बाई बाजारों में प्रभाव | व्यापार, सड़क, पेयजल और कानून-व्यवस्था से प्रभावित |
| महिला एवं युवा | बड़ी मतदाता संख्या | रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुविधाओं से प्रभावित |
विधानसभा क्षेत्र में जाति या धर्म के आधार पर मतदाताओं की कोई आधिकारिक सूची प्रकाशित नहीं होती। इसलिए जातिवार आंकड़ों को वर्तमान आधिकारिक मतदाता संख्या के बजाय पुराने चुनावी और सामाजिक अनुमान के रूप में ही पढ़ा जाना चाहिए। शिकारपुर की सामाजिक पहचान में जाति, पेशा, गांव और स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका अक्सर एक-दूसरे से जुड़ी रहती है।
ग्रामीण मतदाता शिकारपुर की चुनावी दिशा के केंद्र में
पुराने जनसांख्यिकीय आंकड़ों के अनुसार शिकारपुर विधानसभा की करीब 84.3 प्रतिशत आबादी ग्रामीण और 15.7 प्रतिशत शहरी क्षेत्रों से जुड़ी थी। इसी पुराने जनसंख्या आधार में अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी लगभग 26.46 प्रतिशत बताई गई है। यह जनसंख्या आधारित अनुपात है, वर्तमान मतदाता सूची में जातिवार हिस्सेदारी नहीं।
| क्षेत्रीय स्वरूप | पुराना जनसांख्यिकीय अनुपात |
|---|---|
| ग्रामीण आबादी | 84.3% |
| शहरी आबादी | 15.7% |
| अनुसूचित जाति आबादी | 26.46% |
| अनुसूचित जनजाति आबादी | लगभग शून्य |
ग्रामीण बहुलता के कारण खेती, सिंचाई, बिजली, फसल मूल्य, खाद-बीज, आवारा पशु और संपर्क मार्ग चुनावी विमर्श में महत्वपूर्ण रहते हैं। शिकारपुर कस्बे में पेयजल, सड़क, जलनिकासी, सफाई, बाजार और स्वास्थ्य सेवाओं का सवाल अधिक प्रभावी हो सकता है।
2026 में शिकारपुर विधानसभा के 3,05,172 मतदाता
10 अप्रैल 2026 को प्रकाशित अंतिम सूची में शिकारपुर विधानसभा के कुल 3,05,172 मतदाता दर्ज किए गए। इनमें 1,64,540 पुरुष और 1,40,629 महिला मतदाता हैं। थर्ड जेंडर श्रेणी में तीन मतदाता पंजीकृत हैं। बुलंदशहर जिले की सातों विधानसभा सीटों में शिकारपुर में सबसे कम मतदाता दर्ज हुए हैं।
| मतदाता वर्ग | 2026 मतदाता |
|---|---|
| पुरुष मतदाता | 1,64,540 |
| महिला मतदाता | 1,40,629 |
| थर्ड जेंडर मतदाता | 3 |
| कुल मतदाता | 3,05,172 |
पुरुष और महिला मतदाताओं के बीच 23,911 का अंतर है। प्रति एक हजार पुरुष मतदाताओं पर करीब 855 महिला मतदाता दर्ज हैं। महिला मतदाताओं की हिस्सेदारी लगभग 46.08 प्रतिशत है। इस बड़े मतदाता वर्ग के लिए स्वास्थ्य, सुरक्षा, राशन, महंगाई, शिक्षा, पेयजल और सार्वजनिक परिवहन प्रमुख चुनावी विषय बन सकते हैं।
पुनरीक्षण के बाद 34,968 मतदाताओं की कमी
विशेष मतदाता पुनरीक्षण से पहले शिकारपुर विधानसभा में 3,40,140 मतदाता दर्ज थे। अंतिम सूची में संख्या घटकर 3,05,172 रह गई। इस तरह दोनों सूचियों के बीच 34,968 मतदाताओं का अंतर सामने आया, जो पुराने आधार का करीब 10.28 प्रतिशत है।
| मतदाता सूची की स्थिति | मतदाता |
|---|---|
| पुनरीक्षण से पहले | 3,40,140 |
| 2026 की अंतिम सूची | 3,05,172 |
| मतदाताओं का अंतर | 34,968 |
| प्रतिशत अंतर | करीब 10.28% |
मतदाता सूची में हुई कमी वर्ष 2012 की 8,403 वोट वाली जीत से चार गुना से अधिक है। हालांकि इससे किसी जाति, समुदाय या राजनीतिक दल को निश्चित लाभ अथवा नुकसान मानना उचित नहीं होगा। हटे मतदाताओं की सामाजिक पहचान और राजनीतिक पसंद का आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है।
2024 के मुकाबले 35,715 मतदाता कम
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में शिकारपुर विधानसभा में करीब 3,40,887 मतदाता दर्ज थे। वर्ष 2026 की सूची में यह संख्या घटकर 3,05,172 रह गई। दोनों मतदाता सूचियों के बीच 35,715 मतदाताओं का अंतर है।
| चुनाव अथवा वर्ष | पंजीकृत मतदाता |
|---|---|
| 2017 विधानसभा | करीब 3,10,888 |
| 2022 विधानसभा | करीब 3,34,480 |
| 2024 लोकसभा | करीब 3,40,887 |
| 2026 अंतिम सूची | 3,05,172 |
वर्ष 2017 से 2024 के बीच मतदाता आधार बढ़ा था, लेकिन 2026 के पुनरीक्षण में यह संख्या 2017 के स्तर से भी नीचे आ गई। वर्ष 2022 के मुकाबले अंतिम सूची में करीब 29 हजार मतदाता कम हैं। इससे सभी दलों को पुराने समर्थकों, बूथ समितियों और मतदान केंद्रों की दोबारा जांच करनी होगी।
यादव मतदाता समाजवादी पार्टी का सबसे मजबूत आधार?
शिकारपुर के पुराने सामाजिक आकलनों में यादव समुदाय की हिस्सेदारी करीब 18 से 22 प्रतिशत मानी गई है। ग्रामीण और कृषि प्रधान सीट होने के कारण यादव समाज का प्रभाव मतदाता संख्या के साथ पंचायतों, खेती और स्थानीय सामाजिक नेटवर्क में भी दिखाई देता है।
वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी के मुकेश शर्मा ने बसपा के अनिल कुमार को 8,403 वोट से हराकर सीट जीती थी। सपा को उस चुनाव में 64,498 वोट और 34.99 प्रतिशत मत मिले थे। इससे पता चलता है कि यादव आधार के साथ दूसरे पिछड़े, मुस्लिम और स्थानीय समर्थक समूहों का तालमेल पार्टी को जीत दिलाने में सक्षम रहा था।
वर्ष 2017 और 2022 में समाजवादी पार्टी ने सीट राष्ट्रीय लोकदल और दूसरे सहयोगी समीकरणों के जरिए भाजपा को चुनौती दी, लेकिन भाजपा की बढ़त बड़ी रही। वर्ष 2027 में सपा को यादव आधार के साथ मुस्लिम, दलित, कुर्मी और निषाद मतदाताओं में प्रभावी हिस्सेदारी बनानी होगी।
ब्राह्मण मतदाता और मौजूदा विधायक की भूमिका
शिकारपुर में ब्राह्मण मतदाताओं की महत्वपूर्ण मौजूदगी मानी जाती है। वर्तमान विधायक अनिल शर्मा भी ब्राह्मण समाज से आते हैं। वर्ष 2017 और 2022 में भाजपा को क्रमशः 50.26 और 53.05 प्रतिशत वोट मिले। इतनी बड़ी हिस्सेदारी केवल ब्राह्मण मतदाताओं से संभव नहीं थी, लेकिन उम्मीदवार की सामाजिक पहचान ने पार्टी के सवर्ण आधार को एकजुट करने में भूमिका निभाई होगी।
भाजपा ने ब्राह्मण मतों के साथ गैर-यादव पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति के एक हिस्से, ठाकुर और कस्बाई मतदाताओं का व्यापक गठबंधन बनाया। वर्ष 2027 में प्रत्याशी चयन इस गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण होगा। मौजूदा विधायक को दोबारा टिकट मिलने या उम्मीदवार बदलने—दोनों स्थितियों में स्थानीय दावेदारों और कार्यकर्ताओं की प्रतिक्रिया चुनावी अंतर को प्रभावित कर सकती है।
दलित मतदाता भाजपा, बसपा और सपा तीनों के केंद्र में
शिकारपुर विधानसभा 2008 से पहले अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। इससे सीट की राजनीतिक संरचना में दलित नेतृत्व और अनुसूचित जाति मतदाताओं की ऐतिहासिक भूमिका स्पष्ट होती है। पुराने जनसंख्या आंकड़ों में अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी करीब 26.46 प्रतिशत बताई गई है।
वर्ष 2007 में बसपा के वासदेव सिंह ने शिकारपुर से जीत दर्ज की थी। वर्ष 2012 में बसपा के अनिल कुमार को 56,095 वोट मिले और वह दूसरे स्थान पर रहे। वर्ष 2017 में पार्टी को 51,667 और 2022 में 37,358 वोट मिले।
| चुनाव | बसपा उम्मीदवार के वोट | स्थिति |
|---|---|---|
| 2007 | 30,418 | विजेता |
| 2012 | 56,095 | दूसरे स्थान पर |
| 2017 | 51,667 | दूसरे स्थान पर |
| 2022 | 37,358 | तीसरे स्थान पर |
| 2024 लोकसभा खंड | 30,295 | तीसरे स्थान पर |
बसपा को मिले सभी वोट केवल दलित मतदाताओं के नहीं माने जा सकते। उम्मीदवारों के आधार पर पार्टी को मुस्लिम, ब्राह्मण, पिछड़े और दूसरे समुदायों का समर्थन भी मिलता रहा है। फिर भी पार्टी के प्रदर्शन से दलित वोटों की राजनीतिक दिशा का संकेत मिलता है।
वर्ष 2027 में बसपा मजबूत जाटव, मुस्लिम या सर्वसमाज स्वीकार्यता वाला उम्मीदवार उतारती है तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है। पार्टी कमजोर रहती है तो अनुसूचित जाति मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने के लिए भाजपा और समाजवादी पार्टी के बीच सीधी प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।
मुस्लिम मतदाताओं की दिशा विपक्ष के लिए महत्वपूर्ण
शिकारपुर विधानसभा में मुस्लिम मतदाताओं की महत्वपूर्ण मौजूदगी मानी जाती है। कस्बे और कई ग्रामीण इलाकों में यह समुदाय परिणाम प्रभावित करने की स्थिति में है। वर्ष 2022 में बसपा ने मोहम्मद रफीक को उम्मीदवार बनाया था और उन्हें 37,358 मत मिले। इससे मुस्लिम और दलित आधार पर बसपा की हिस्सेदारी का संकेत मिलता है, हालांकि समुदायवार मतदान का कोई आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है।
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के लिए मुस्लिम मतदाता महत्वपूर्ण शुरुआती आधार हो सकते हैं। लेकिन वर्ष 2022 और 2024 के परिणाम बताते हैं कि भाजपा की बढ़त समाप्त करने के लिए विपक्ष को यादव-मुस्लिम समीकरण के साथ दलित, कुर्मी, निषाद और भाजपा से असंतुष्ट सवर्ण मतदाताओं का समर्थन भी चाहिए।
बसपा मजबूत मुस्लिम या दलित-मुस्लिम समीकरण वाला उम्मीदवार उतारती है तो विपक्षी मतों का विभाजन बढ़ सकता है। दूसरी ओर मुकाबला दो प्रमुख उम्मीदवारों में सीमित हुआ तो भाजपा की मौजूदा बढ़त पर दबाव बन सकता है।
कुर्मी, निषाद और दूसरे पिछड़े समुदाय
शिकारपुर के कुछ क्षेत्रों में कुर्मी समाज की उल्लेखनीय मौजूदगी मानी जाती है। निषाद-मल्लाह मतदाता भी क्षेत्रीय रूप से केंद्रित हैं। इन समुदायों की वर्तमान आधिकारिक संख्या उपलब्ध नहीं है, लेकिन करीबी बूथों पर इनका समर्थन निर्णायक हो सकता है।
भाजपा गैर-यादव पिछड़े समुदायों को अपने मौजूदा सामाजिक गठबंधन में बनाए रखना चाहेगी। समाजवादी पार्टी PDA रणनीति के माध्यम से यादव आधार से बाहर कुर्मी, निषाद और अन्य पिछड़े समूहों में समर्थन बढ़ाने की कोशिश करेगी।
इन समुदायों का मतदान केवल जातीय पहचान से तय नहीं होता। स्थानीय उम्मीदवार, पंचायत संबंध, सरकारी योजनाओं की पहुंच, खेती और गांव की बुनियादी सुविधाएं इनके निर्णय को प्रभावित कर सकती हैं।
ठाकुर और कस्बाई मतदाताओं की भूमिका
शिकारपुर में ठाकुर मतदाताओं की मध्यम लेकिन महत्वपूर्ण मौजूदगी मानी जाती है। भाजपा के सवर्ण सामाजिक आधार में ब्राह्मणों के साथ ठाकुर मतदाता भी भूमिका निभाते हैं। विपक्ष के लिए इस आधार में सीमित सेंध भी महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि पिछले दो विधानसभा चुनावों में भाजपा को आधे से अधिक मत मिले हैं।
कस्बाई क्षेत्रों में वैश्य, व्यापारी और सेवा क्षेत्र से जुड़े परिवारों के लिए कानून-व्यवस्था, बाजार की सड़कें, पार्किंग, पेयजल, सफाई और जलनिकासी प्रमुख विषय हैं। जातीय पहचान से अलग स्थानीय प्रशासन और सुविधाओं का अनुभव इस वर्ग के मतदान को प्रभावित कर सकता है।
2022 में भाजपा ने 55,683 वोट से जीती सीट
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के अनिल शर्मा को 1,13,855 वोट और 53.05 प्रतिशत मत मिले। राष्ट्रीय लोकदल के किरणपाल सिंह ने 58,172 और बसपा के मोहम्मद रफीक ने 37,358 वोट हासिल किए। भाजपा ने चुनाव 55,683 मतों के अंतर से जीता।
| उम्मीदवार | पार्टी | वोट | वोट शेयर |
|---|---|---|---|
| अनिल शर्मा | भाजपा | 1,13,855 | 53.05% |
| किरणपाल सिंह | राष्ट्रीय लोकदल | 58,172 | 27.11% |
| मोहम्मद रफीक | बसपा | 37,358 | 17.41% |
| जियाउर्रहमान | कांग्रेस | 1,542 | 0.72% |
| NOTA | — | 1,452 | 0.68% |
| जीत का अंतर | — | 55,683 | 25.94% |
भाजपा को अकेले आधे से अधिक मत मिले। राष्ट्रीय लोकदल और बसपा के उम्मीदवारों को संयुक्त रूप से करीब 95 हजार वोट मिले, लेकिन अलग-अलग सामाजिक तथा राजनीतिक विकल्प होने के कारण इन्हें सीधे एक उम्मीदवार के वोट के रूप में नहीं देखा जा सकता।
2017 में भाजपा ने 50,245 वोट से पलटी थी सीट
वर्ष 2017 में भाजपा के अनिल शर्मा को 1,01,912 वोट और 50.26 प्रतिशत मत मिले। बसपा के मुकुल उपाध्याय को 51,667 और कांग्रेस के उदय करण सिंह दलाल को 32,914 मत प्राप्त हुए। भाजपा ने 50,245 वोट से सीट जीती।
| उम्मीदवार | पार्टी | वोट | वोट शेयर |
|---|---|---|---|
| अनिल शर्मा | भाजपा | 1,01,912 | 50.26% |
| मुकुल उपाध्याय | बसपा | 51,667 | 25.48% |
| उदय करण सिंह दलाल | कांग्रेस | 32,914 | 16.24% |
| मुकेश शर्मा | राष्ट्रीय लोकदल | 7,734 | 3.82% |
| NOTA | — | 2,115 | 1.05% |
| जीत का अंतर | — | 50,245 | 24.78% |
बसपा, कांग्रेस और रालोद के अलग-अलग उम्मीदवारों के कारण विपक्षी मतों का विभाजन हुआ। भाजपा ने ब्राह्मण उम्मीदवार के साथ सवर्ण, गैर-यादव OBC और दलित मतों का बड़ा हिस्सा जोड़कर समाजवादी पार्टी से सीट छीन ली।
2012 में समाजवादी पार्टी ने 8,403 वोट से जीती थी सीट
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के मुकेश शर्मा को 64,498 वोट और 34.99 प्रतिशत मत मिले। बसपा के अनिल कुमार को 56,095 और राष्ट्रीय लोकदल के किरणपाल सिंह को 45,312 वोट प्राप्त हुए। सपा ने चुनाव 8,403 मतों से जीता।
| उम्मीदवार | पार्टी | वोट | वोट शेयर |
|---|---|---|---|
| मुकेश शर्मा | समाजवादी पार्टी | 64,498 | 34.99% |
| अनिल कुमार | बसपा | 56,095 | 30.43% |
| किरणपाल सिंह | राष्ट्रीय लोकदल | 45,312 | 24.58% |
| जयप्रकाश गुप्ता | भाजपा | 9,884 | 5.37% |
| जीत का अंतर | — | 8,403 | 4.56% |
वर्ष 2012 में केवल 5.37 प्रतिशत वोट पाने वाली भाजपा ने पांच वर्ष बाद अपना मत बढ़ाकर 50 प्रतिशत से अधिक कर लिया। यह शिकारपुर की राजनीति में सबसे बड़ा बदलाव था। वर्ष 2022 में भाजपा का वोट शेयर और बढ़कर 53.05 प्रतिशत हो गया।
पिछले चार विधानसभा चुनावों का परिणाम
| चुनाव | विजेता | पार्टी | विजेता के वोट | जीत का अंतर |
|---|---|---|---|---|
| 2007 | वासदेव सिंह | बसपा | 30,418 | 4,274 |
| 2012 | मुकेश शर्मा | समाजवादी पार्टी | 64,498 | 8,403 |
| 2017 | अनिल शर्मा | भाजपा | 1,01,912 | 50,245 |
| 2022 | अनिल शर्मा | भाजपा | 1,13,855 | 55,683 |
वर्ष 2007 से 2022 के बीच बसपा, समाजवादी पार्टी और भाजपा ने सीट जीती। इससे स्पष्ट है कि शिकारपुर किसी एक दल का पारंपरिक स्थायी गढ़ नहीं रहा, लेकिन 2017 के बाद भाजपा ने मजबूत बढ़त बनाई है।
शिकारपुर विधानसभा का राजनीतिक इतिहास
शिकारपुर विधानसभा का पहला चुनाव 1957 में हुआ था। परिसीमन से पहले यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित थी। वर्ष 2008 के बाद इसे सामान्य सीट में बदल दिया गया और विधानसभा संख्या 69 निर्धारित हुई। वर्तमान क्षेत्र में शिकारपुर तहसील के साथ जहांगीराबाद क्षेत्र का कतियावली हिस्सा शामिल है।
वर्ष 2002 में भाजपा के मुंशीलाल गौतम, 2007 में बसपा के वासदेव सिंह, 2012 में सपा के मुकेश शर्मा और 2017 तथा 2022 में भाजपा के अनिल शर्मा विधायक चुने गए। इस इतिहास में दलित नेतृत्व, किसान राजनीति, पिछड़ा वर्ग और ब्राह्मण उम्मीदवार—सभी को अलग-अलग दौर में सफलता मिली है।
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा को 45,681 वोट की बढ़त
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में शिकारपुर विधानसभा खंड से भाजपा को 99,734 वोट मिले। कांग्रेस को 54,053 और बसपा को 30,295 मत प्राप्त हुए। भाजपा ने कांग्रेस पर 45,681 वोट की बढ़त बनाई।
| 2024 लोकसभा: शिकारपुर विधानसभा खंड | वोट | वोट शेयर |
|---|---|---|
| भाजपा | 99,734 | 53.15% |
| कांग्रेस | 54,053 | 28.81% |
| बसपा | 30,295 | 16.14% |
| भाजपा की बढ़त | 45,681 | — |
वर्ष 2019 में भाजपा को शिकारपुर खंड से 1,21,117 और बसपा को 71,977 वोट मिले थे। भाजपा की बढ़त 49,140 वोट थी। वर्ष 2024 में बढ़त कुछ कम हुई, लेकिन पार्टी का मत प्रतिशत 53 प्रतिशत से ऊपर बना रहा।
भाजपा का मजबूत चुनावी गणित
भाजपा की सबसे बड़ी ताकत मौजूदा विधायक, लगातार दो विधानसभा जीत और ब्राह्मण-सवर्ण-गैर यादव OBC-दलित मतदाताओं का व्यापक गठबंधन है। वर्ष 2017, 2022 और 2024 में पार्टी ने 50 प्रतिशत से अधिक मत हासिल किए।
राष्ट्रीय लोकदल अब भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन में है और दोनों दल 2027 के लिए बूथ स्तर पर समन्वय बढ़ा रहे हैं। वर्ष 2022 में भाजपा के खिलाफ चुनाव लड़ने वाला रालोद उम्मीदवार शिकारपुर में दूसरे स्थान पर रहा था। गठबंधन के बाद भाजपा को किसान और ग्रामीण मतदाताओं के बीच अतिरिक्त संगठनात्मक लाभ मिल सकता है, लेकिन पुराने विपक्षी वोटों का पूरा हस्तांतरण स्वतः मान लेना सही नहीं होगा।
भाजपा के सामने दो कार्यकाल की स्थानीय सत्ता विरोधी भावना, टिकट को लेकर संभावित दावेदारी, नगर की जलनिकासी, पेयजल और ग्रामीण समस्याएं प्रमुख चुनौतियां होंगी।
समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के लिए जीत का रास्ता
समाजवादी पार्टी के लिए यादव और मुस्लिम मतदाता शुरुआती आधार बन सकते हैं। कांग्रेस के साथ तालमेल कायम रहने की स्थिति में 2024 में मिले 54 हजार से अधिक मत विपक्ष के लिए आधार हो सकते हैं, लेकिन भाजपा की बढ़त समाप्त करने के लिए दलित, कुर्मी, निषाद और भाजपा से असंतुष्ट ब्राह्मण मतदाताओं का समर्थन भी जरूरी होगा।
वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी ने बहुकोणीय मुकाबले में सीट जीती थी। वर्ष 2027 में विपक्ष के लिए उम्मीदवार की स्थानीय स्वीकार्यता सबसे महत्वपूर्ण होगी। केवल पार्टी या जातीय पहचान के बजाय ऐसा चेहरा चाहिए, जो ग्रामीण और कस्बाई दोनों मतदाताओं में प्रभाव रखता हो।
बसपा के बिना अधूरा रहेगा शिकारपुर का समीकरण
बसपा ने वर्ष 2007 में शिकारपुर सीट जीती थी और 2012 तथा 2017 में दूसरे स्थान पर रही। वर्ष 2022 में उसे 37,358 और 2024 के लोकसभा चुनाव में 30,295 वोट मिले। इससे स्पष्ट है कि पार्टी का दलित और अन्य सामाजिक आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
बसपा मजबूत दलित, मुस्लिम या ब्राह्मण उम्मीदवार उतारती है तो मुख्य मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकती है। उसका वोट बढ़ता है तो भाजपा के दलित समर्थन और समाजवादी पार्टी-कांग्रेस के मुस्लिम-दलित समीकरण दोनों पर असर पड़ेगा।
पेयजल और पाइपलाइन विस्तार बड़ा नगर मुद्दा
शिकारपुर नगर में पेयजल व्यवस्था सुधारने के लिए करीब 1.24 करोड़ रुपये के विकास कार्यों की योजना बनाई गई है। इसमें 68.78 लाख रुपये से लगभग 4,400 मीटर नई पाइपलाइन, 9.07 लाख रुपये से 15 हैंडपंप, 9.93 लाख रुपये से सीसी मार्ग और पुलिया मरम्मत तथा 29.34 लाख रुपये से कचरा प्रबंधन केंद्र का ढांचा तैयार करने का प्रस्ताव शामिल है।
ये योजनाएं बताती हैं कि पेयजल, खराब सड़क, क्षतिग्रस्त पुलिया और सफाई व्यवस्था नगर के प्रमुख स्थानीय विषय हैं। कार्य समय पर और गुणवत्तापूर्ण ढंग से पूरे होते हैं तो सत्तारूढ़ दल को लाभ मिल सकता है। देरी या खराब गुणवत्ता विपक्ष के लिए मुद्दा बनेगी।
जलभराव और स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंच का सवाल
जुलाई 2026 की बारिश में खुर्जा-शिकारपुर मार्ग पर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और ब्लॉक कार्यालय के सामने जलभराव की स्थिति सामने आई। इससे राहगीरों, मरीजों और विद्यार्थियों को परेशानी हुई। यह समस्या नगर की जलनिकासी व्यवस्था को चुनावी बहस में बनाए रख सकती है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तक सुरक्षित पहुंच, डॉक्टरों की उपलब्धता, जांच सुविधाएं और आपातकालीन उपचार ग्रामीण तथा कस्बाई दोनों मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं का वास्तविक अनुभव जातीय सीमाओं से बाहर मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकता है।
किसान, सिंचाई और ग्रामीण सड़कें
शिकारपुर की ग्रामीण बहुलता के कारण खेती और किसान समस्याएं चुनावी विमर्श का बड़ा हिस्सा रहेंगी। सिंचाई, बिजली, खाद की उपलब्धता, फसल मूल्य, गन्ना भुगतान, आवारा पशु और गांवों की संपर्क सड़कें प्रमुख मुद्दे हो सकते हैं। बुलंदशहर जिले में वर्ष 2026 के दौरान गन्ना भुगतान और खाद की उपलब्धता के सवाल किसान बैठकों में उठाए गए थे।
भाजपा विकास कार्यों और किसान योजनाओं को सामने रखेगी। विपक्ष भुगतान, लागत, सिंचाई और स्थानीय स्तर पर शिकायतों के निस्तारण को मुद्दा बना सकता है। ग्रामीण मतदाताओं के लिए प्रत्याशी की उपलब्धता और प्रशासन से काम कराने की क्षमता भी महत्वपूर्ण रहेगी।
2026 की नई मतदाता सूची ने बदला बूथवार गणित
शिकारपुर में पुनरीक्षण के बाद 34,968 मतदाताओं का अंतर सामने आया है। वर्ष 2024 के मुकाबले भी मतदाता आधार करीब 35,715 कम हुआ है। इसलिए वर्ष 2022 और 2024 के बूथवार आंकड़ों को 2027 की मतदाता सूची पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
भाजपा को अपने ब्राह्मण, गैर-यादव OBC, दलित और ग्रामीण समर्थकों के नाम जांचने होंगे। सपा-कांग्रेस को यादव, मुस्लिम और विपक्ष समर्थक क्षेत्रों में पंजीकरण पर ध्यान देना होगा। बसपा को दलित बहुल मतदान केंद्रों पर पुराने समर्थकों का सत्यापन करना पड़ेगा।
नई सूची किसी पार्टी की जीत या हार तय नहीं करती, लेकिन वर्ष 2012 में केवल 8,403 वोट से तय हुई सीट पर कुछ हजार मतदाताओं और मतदान प्रतिशत का बदलाव भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है।
2027 में इन दस सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों पर रहेगी नजर
पहला सवाल यादव मतदाताओं की दिशा का होगा। समाजवादी पार्टी के लिए यह सबसे मजबूत शुरुआती आधार है, लेकिन जीत के लिए दूसरे समुदायों का समर्थन आवश्यक होगा।
दूसरा, ब्राह्मण मतदाता होंगे। वर्तमान विधायक और भाजपा की लगातार दो जीत पार्टी को इस वर्ग में बढ़त देती है।
तीसरा, दलित मतों का बंटवारा होगा। भाजपा, बसपा और समाजवादी पार्टी तीनों अनुसूचित जाति मतदाताओं में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश करेंगी।
चौथा, मुस्लिम मतों की एकजुटता होगी। सपा-कांग्रेस और बसपा के बीच इन मतों का वितरण मुख्य मुकाबले की दिशा प्रभावित करेगा।
पांचवां, भाजपा-रालोद तालमेल होगा। वर्ष 2022 में भाजपा के खिलाफ रहा रालोद अब NDA का हिस्सा है। ग्रामीण वोटों का वास्तविक हस्तांतरण महत्वपूर्ण रहेगा।
छठा, कुर्मी और निषाद मतदाता होंगे। गैर-यादव पिछड़े समुदाय भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों की रणनीति के केंद्र में रहेंगे।
सातवां, बसपा का उम्मीदवार होगा। मजबूत दलित या मुस्लिम चेहरा मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है।
आठवां, प्रत्याशी चयन होगा। दो बार के विधायक को फिर अवसर मिलता है या नया चेहरा आता है, इससे स्थानीय संगठन और सामाजिक समर्थन प्रभावित हो सकता है।
नौवां, पेयजल, जलभराव और ग्रामीण सड़कें होंगी। स्थानीय सुविधाओं का मुद्दा जातीय सीमाओं से बाहर पूरे मतदाता वर्ग पर असर डालेगा।
दसवां और सबसे नया फैक्टर 2026 की 3,05,172 मतदाताओं वाली अंतिम सूची है। करीब 35 हजार मतदाताओं के अंतर के बाद सभी दलों को बूथवार गणित नए सिरे से बनाना होगा।
वर्ष 2012 में समाजवादी पार्टी की 8,403 वोट की जीत, 2017 में भाजपा की 50,245 वोट की बढ़त, 2022 में 55,683 वोट की विजय और 2024 के लोकसभा चुनाव में 45,681 वोट की विधानसभा-खंड बढ़त शिकारपुर में भाजपा के मजबूत वर्तमान आधार को दिखाती है। इसके बावजूद यादव-मुस्लिम समीकरण, दलित मतों की दिशा, भाजपा-रालोद वोट ट्रांसफर, बसपा की रणनीति, प्रत्याशी चयन और नई मतदाता सूची 2027 में वास्तविक मुकाबले का स्वरूप तय करेंगे।
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प्रत्याशियों, गठबंधन, टिकट वितरण और सीटवार राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े अपडेट के लिए 2027 के विधानसभा चुनाव की विस्तृत कवरेज पढ़ें।
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