सोना कैसे और क‍ितना तपा, ये तो 'कुंदन' ही बता सकता है! जान‍िए 'असली' NEET टॉपर की कहानी

Published on 23 जुल॰ 2026

संघर्ष, संकल्प और सपनों के दम पर कोई भी मंजिल हासिल की जा सकती है. इस बात को बूंदी जिले के छोटे से गांव पाली के रहने वाले कुंदन मीणा ने सच साबित कर दिखाया है. किसान परिवार से जुड़े इस होनहार छात्र ने देश की सबसे प्रतिष्ठित मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET में शानदार सफलता हासिल करते हुए 602 अंक, 9,486 ऑल इंडिया रैंक और अपनी कैटेगरी में 65वीं रैंक प्राप्त की है. कुंदन की यह उपलब्धि न केवल उनके परिवार, बल्कि पूरे बूंदी जिले और हाड़ौती क्षेत्र के लिए गर्व का विषय बन गई है.

पढ़ाई छोड़ एक साल तक संभाली खेती

कुंदन के पिता सरकारी स्कूल में शिक्षक हैं, जबकि उनकी माता गृहिणी हैं. शिक्षक पिता ने शुरू से ही बच्चों की पढ़ाई को सर्वोच्च प्राथमिकता दी. इसी का परिणाम था कि कुंदन का चयन कक्षा 6 में जवाहर नवोदय विद्यालय में हो गया और उन्होंने 11वीं तक वहीं पढ़ाई की.

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लेकिन तभी देश में कोरोना महामारी और लॉकडाउन ने सब कुछ बदल दिया. 8वीं और 9वीं कक्षा के दौरान परिवार पर आर्थिक और सामाजिक चुनौतियां आ खड़ी हुईं. घर के बड़े बेटे होने के कारण कुंदन ने अपनी पढ़ाई को कुछ समय के लिए पीछे छोड़ दिया और परिवार का सहारा बनने का फैसला किया.

करीब एक साल तक उन्होंने पढ़ाई से लगभग दूरी बनाकर खेती की पूरी जिम्मेदारी संभाली. खेतों में खुद ट्रैक्टर चलाया, बुआई की और एक किसान की तरह दिन-रात मेहनत की. उस दौर में किताबों की जगह खेत और पढ़ाई की जगह परिवार की जिम्मेदारियां उनकी प्राथमिकता बन गई थीं.

पिता के संघर्ष ने जगाया बड़ा सपना

कुंदन बताते हैं कि उनके पिता ने उन्हें और उनके भाई-बहनों को अच्छी शिक्षा दिलाने के लिए जीवनभर संघर्ष किया. गांव के उस माहौल में, जहां अक्सर पढ़ाई से ज्यादा दूसरे कामों को महत्व दिया जाता है, वहां उनके पिता हमेशा शिक्षा को सबसे ऊपर रखते थे.

लॉकडाउन के दौरान खेतों में काम करते हुए कुंदन ने अपने पिता और चाचा की मेहनत और संघर्ष को बहुत करीब से देखा. पिता अक्सर उनसे कहते थे, "बेटा, तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, यह सब हम संभाल लेंगे." लेकिन परिवार की परिस्थितियों को देखते हुए कुंदन ने खेती में हाथ बंटाना जरूरी समझा.

यही संघर्ष उनके जीवन का सबसे बड़ा टर्निंग प्वाइंट बना. उन्होंने उसी समय तय कर लिया कि वे कुछ ऐसा करेंगे, जिससे माता-पिता का संघर्ष सफल हो और गांव, परिवार व जिले का नाम रोशन हो.

छूटा हुआ सिलेबस भी मेहनत से किया पूरा

लॉकडाउन समाप्त होने के बाद कुंदन ने दोबारा पूरी लगन के साथ पढ़ाई शुरू की. 8वीं और 9वीं कक्षा का छूटा हुआ सिलेबस उन्होंने 10वीं में अतिरिक्त मेहनत करके पूरा किया. लगातार मेहनत, अनुशासन और आत्मविश्वास के दम पर उन्होंने अपनी पढ़ाई को फिर से पटरी पर लाया.

कोटा पहुंचकर मिली सपनों को नई उड़ान

12वीं कक्षा पूरी करने के बाद कुंदन ने डॉक्टर बनने के अपने सपने को साकार करने के लिए एक साल का ड्रॉप लिया और शिक्षा नगरी कोटा पहुंचे. यहां उन्होंने पीडब्ल्यू विद्यापीठ से NEET की तैयारी की.

कुंदन बताते हैं कि 11वीं कक्षा में उनकी पढ़ाई कुछ खास नहीं रही थी, लेकिन 12वीं में उन्होंने कड़ी मेहनत की. बेहतर परिणाम मिलने के बाद उनका आत्मविश्वास बढ़ा और उन्होंने कोटा में रहकर अपनी तैयारी को अंतिम रूप दिया.

कुंदन अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय अपने माता-पिता, गुरुजनों और परिवार को देते हैं. उनका कहना है कि अगर परिवार का साथ, शिक्षकों का मार्गदर्शन और खुद पर विश्वास न होता, तो यह सफलता संभव नहीं थी.

एक समय ऐसा भी था जब लॉकडाउन के कारण उनकी पढ़ाई छूटने की नौबत आ गई थी और वे खेतों में ट्रैक्टर चलाकर परिवार की जिम्मेदारी निभा रहे थे. आज वही किसान परिवार का बेटा अपनी मेहनत, संघर्ष और माता-पिता के आशीर्वाद के दम पर डॉक्टर बनने के बेहद करीब पहुंच चुका है.

कुंदन मीणा की कहानी उन लाखों विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा है, जो कठिन परिस्थितियों को अपनी मंजिल की राह में बाधा मान लेते हैं. यह सफलता बताती है कि हालात चाहे कितने भी मुश्किल क्यों न हों, यदि इरादे मजबूत हों, मेहनत ईमानदार हो और परिवार का आशीर्वाद साथ हो, तो खेतों से उठकर भी देश की सबसे कठिन परीक्षाओं में परचम लहराया जा सकता है.

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