नवभारत संपादकीय: हिमालय में कितना सुरक्षित है सुरंग बनाना? जानिए क्यों मंडरा रहा मजदूरों की जिंदगी पर खतरा| Navbharat Live

Published on 24 जुल॰ 2026

नवभारत संपादकीय: हिमालय में कितना सुरक्षित है सुरंग बनाना? जानिए क्यों मंडरा रहा मजदूरों की जिंदगी पर खतरा

  • Written By:

    अनन्या तिवारी

Updated On: Jul 24, 2026 | 10:16 AM IST

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सार

Himalaya Tunnel Risk: हिमालयी क्षेत्र में सुरंग निर्माण जोखिम भरा है। तीस्ता-6 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट और सिल्कयारा हादसों से स्पष्ट है कि मिथेन गैस व भुरभुरी चट्टानें मजदूरों के लिए जानलेवा है।

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(नवभारत डिजाइन फोटो)

विस्तार

Himalaya Tunnel Construction Safety Risks: हिमालय में जलविद्युत परियोजनाओं, सड़कों, रेल पटरी विबिछाने के लिए सुरंगों का निर्माण अत्यंत चुनौतीपूर्ण व जोखिम भरा है। गत 20 जुलाई को तीस्ता स्टेज 6 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की निर्माणाधीन सुरंग मिथेन गैस के लीकेज की वजह से ढह गई, जिसमें फंसे मजदूरों को बचाने का प्रयास किया गया। इसके बावजूद इस दुर्घटना में कम से कम 20 श्रमिकों की मौत हो गई। इसके पहले 5 जुलाई को उत्तराखंड की सिल्कयारा-बारकोट सुरंग के निर्माण के दौरान सुरंग के भीतर चट्टान गिरने से एक श्रमिक की मृत्यु हो गई थी। ऐसे हादसों के बाद मृत गरीब प्रवासी श्रमिक के परिजनों को मुआवजा देकर मामला निपटा दिया जाता है लेकिन दुर्घटना के कारणों व सावधानी के उपायों पर विचार नहीं किया जाता।

भौगोलिक चुनौतियां और इंजीनियरिंग की कठिन परीक्षा

हिमालय के क्षेत्र की भूगर्भीय स्थिति तथा वहां की चट्टानों का भुरभुरा होना, निर्माण कार्य के लिए बड़ी चुनौती है। वहां भूकंप व भूस्खलन के अलावा मिथेन जैसी जहरीली गैस का जोखिम बना रहता है। इसके पहले इस क्षेत्र में कभी भी इतनी सुरंगें नहीं खोदी गई थीं जो अब खोदी जा रही हैं। यहां इस तरह का निर्माण कार्य इंजीनियरिंग का चमत्कार तो है, लेकिन इसके साथ जानलेवा खतरा भी है।

मौत कभी भी जिंदगी पर झपट्टा मार सकती उल्लेखनीय है कि 3 वर्ष पूर्व 2023 में भी सिल्कयारा में सुरंग दुर्घटना हुई थी। जिसमें बड़ी तादाद में चट्टानें ढह जाने की वजह से सुरंग का मुंह बंद हो गया था और अनेक मजदूर बंद हो गए थे, उन्हें बचा पाना बहुत कठिन था। सुरंग को खोलने के लिए चट्टान काटने वाली बड़ी विदेशी मशीनें लाई गई, जिनके कटर-ब्लेड टूट गए, कई दिनों से अंदर फंसे मजदूरों के लिए ऑक्सीजन की कमी, भोजन-पानी का अभाव, घना अंधेरा जैसी भयानक समस्याएं थीं। वहां ब्लास्ट करना खतरे से खाली नहीं था। सारी तकनीक विफल हो रही थी। ऐसी हालत में अंतिम उपाय के रूप में छेनी-हथोड़े से चट्टान काटकर बचाव का रास्ता बनाने वाले रैट माइनर्स को बुलाया गया।

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रैट माइनर्स की बहादुरी और सुरक्षा प्रोटोकॉल की जरूरत

उन्होंने कई दिनों तक अनवरत प्रयास जारी रखकर सुरंग में फंसे श्रमिकों की जान बचाई और बाहर निकाला। तब सारे देश का ध्यान उसी ओर लगा हुआ था। बचाए गए श्रमिकों को एक तरह से दूसरी जिंदगी मिली थी क्योंकि उनके जीवित बचने की उम्मीद नहीं के बराबर रह गई थी। हिमालय क्षेत्र की चट्टानों में मिथेन के ‘पकिट’ हैं जिनमें कभी भी विस्फोट हो सकता है।

इसे देखते हुए चट्टान काटने से पहले वहां जगह-जगह छेद कर जहरीली गैस को बाहर निकालना जरूरी होता है। श्रमिकों की सुरक्षा के तमाम एहतियाती उपाय भी करने पड़ते हैं। इस तरह की सावधानी का प्रोटोकॉल या स्थायी सुरक्षा नियम पहले से निर्धारित हैं लेकिन 20 श्रमिकों की जिस तरह मौत हुई है, उससे लगता है कि प्रोटोकॉल का पालन करने में कहीं न कहीं चूक रह गई।

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