Sarva Pitru Amavasya 2026: घर पर सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध कैसे करें? जानें पूजा सामग्री से लेकर विधि तक

Published on 8 अक्टू॰ 2026

Sarva Pitru Amavasya 2026: घर पर सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध कैसे करें? जानें पूजा सामग्री से लेकर विधि तक

सर्वपितृ अमावस्या 2026Image Credit source: PTI

Pitru Paksha 2026: हिंदू धर्म में 16 दिनों तक चलने वाला पितृपक्ष हमारे पूर्वजों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और आत्मिक जुड़ाव का महापर्व है. पंचांग के अनुसार, साल 2026 में आश्विन मास की सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर, शनिवार को मनाई जाएगी. इसे पितृ विसर्जनी अमावस्या, महालया भी कहा जाता है. यह तिथि पूरे पितृ पक्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन मानी जाती है, क्योंकि इस दिन उन सभी पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध और तर्पण किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि हमें ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश तय तिथि पर छूट गया हो. आइए जानते हैं, यदि आप किसी तीर्थ स्थल पर नहीं जा पा रहे हैं तो घर पर रहकर कैसे विधि-विधान के साथ अनुष्ठान को पूरा करें.

सर्वपितृ अमावस्या पर घर में श्राद्ध के लिए क्या-क्या सामग्री चाहिए?

घर पर श्राद्ध करने से पहले पूजा की सभी जरूरी सामग्री एक जगह रख लेना अच्छा रहता है. श्राद्ध के लिए जरूरी चीजों में कुश, काले तिल, जौ, अक्षत यानी चावल, जल, फूल, चंदन, दीपक, धूप, घी, मौसमी फल, मिठाई और सात्विक भोजन होना चाहिए. और अगर पिंड बनाने की परंपरा हो तो चावल और तिल आदि की भी जरूरत पड़ती है. इसके अलावा पितरों के नाम और गोत्र का स्मरण करने के लिए उनकी जानकारी पहले से तैयार रखें. श्राद्ध में श्रद्धा और संकल्प को महत्वपूर्ण माना जाता है, इसलिए पूजा करते समय जिस पितर के लिए श्राद्ध किया जा रहा है, उनका नाम और गोत्र सही तरीके से बोलना चाहिए.

घर पर सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध कैसे करें?

सुबह स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें. इसके बाद पूजा और श्राद्ध के लिए घर में साफ स्थान चुनें. यदि हो सके तो दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके पितरों का स्मरण किया जाता है. सबसे पहले भगवान विष्णु, कुलदेवता या इष्टदेव का स्मरण करके पूजा शुरू कर सकते हैं. इसके बाद अपने पितरों का ध्यान करें और मन में उनका स्मरण करते हुए श्राद्ध का संकल्प लें. संकल्प में अपने पितर का नाम, गोत्र और उनसे अपना संबंध बोलना चाहिए. अगर किसी पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है, तो सर्वपितृ अमावस्या पर उनके लिए श्राद्ध करने का संकल्प लिया जा सकता है. इसके बाद जल में काले तिल और कुश डालकर पितरों के लिए तर्पण करें. तर्पण करते समय श्रद्धा के साथ पितरों का स्मरण करें.

कौवे और गाय को भोजन कराने की क्या मान्यता है?

श्राद्ध कर्म में कौवे को भोजन कराने की परंपरा काफी पुरानी है. धार्मिक मान्यता में कौवे को पितरों का प्रतीक माना जाता है. इसलिए श्राद्ध का भोजन निकालकर कौवे को खिलाने की परंपरा कई परिवारों में है. इसी तरह गाय को भोजन कराने और कुत्ते आदि जीवों को भी भोजन देने की परंपरा भी देखने को मिलती है.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. टीवी9 भारतवर्ष इसकी पुष्टि नहीं करता है.

वरुण चौहान

वरुण चौहान

इलेक्‍ट्रानिक और डिजिटल मीडिया में करीब एक दशक से ज्यादा का अनुभव. 2008 में एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन (AAFT) नोएडा से पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद कुछ अलग और नया करने की सोच के साथ मीडिया में अपने सफर की शुरुआत की. शुरुआत से ही मेरी रुचि उन विषयों को आम लोगों तक पहुंचाने में रही है, जो भारतीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं से जुड़े हैं. अपने करियर के दौरान Channel One News, Sahara Samay, A2Z News, News Express, National Voice और पंजाब केसरी डिजिटल जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला. इन संस्थानों में काम करते हुए समाचार लेखन, फील्ड रिपोर्टिंग,और डिजिटल कंटेंट को सीखने का अनुभव मिला. फिलहाल देश के सबसे बड़े न्यूज नेटवर्क TV9 भारतवर्ष में धर्म और आस्था से जुड़ी खबरों, धार्मिक आयोजनों, ज्योतिष, वास्तु, पौराणिक कथाओं, मंदिरों की परंपराओं और व्रत-त्योहारों से जुड़े विषयों को सरल, सहज और तथ्यपूर्ण भाषा में पाठकों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभा रहा हूं. महाकुंभ 2025 की कवरेज मेरे करियर के महत्वपूर्ण अनुभवों में शामिल है, जहां करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था, अखाड़ों की परंपराओं, संत समाज की गतिविधियों और कुंभ से जुड़े धार्मिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर विस्तार से लिखने का अवसर मिला. इसके अलावा चारधाम यात्रा, सावन, नवरात्रि, दीपावली, होली, छठ पूजा, अमरनाथ यात्रा, रमज़ान और अन्य प्रमुख धार्मिक आयोजनों पर भी लगातार लेखन किया है. भारतीय संस्कृति, धर्म-दर्शन, ज्योतिष, अंक ज्योतिष, वास्तु शास्त्र, पुराणों और लोक आस्थाओं के अध्ययन में विशेष रुचि रखता हूं. मेरा प्रयास हमेशा यही रहता है कि धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को सरल भाषा के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया जाए, ताकि वे अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को बेहतर ढंग से समझ सकें.

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