इंदौर, 30 सितंबर 2026: SC/ST ACT यानी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम के दुरुपयोग का एक और मामला सामने आया है। पहले जिले के सत्र न्यायालय ने और अब हाईकोर्ट ने भी यह माना कि, मामले में एट्रोसिटी एक्ट की कोई जरूरत ही नहीं थी, लेकिन न्याय तक पहुंचने में युवक को पूरे 11 साल लग गए। वह 11 साल तक एक ऐसे कलंक के साथ जीता रहा, जो उसने किया ही नहीं था।
मामले की पृष्ठभूमि
मामला सितंबर 2015 का है, जब शिकायतकर्ता महिला ने अपनी 17 वर्षीय बेटी के अचानक गायब होने पर थाना राजगढ़/सरदारपुर में प्राथमिकी (Crime No. 232/2015) दर्ज कराई थी। पुलिस द्वारा 26 सितंबर 2015 को किशोरी को बरामद किया गया था। पुलिस जांच के दौरान मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 363 (अपहरण), पोक्सो (POCSO) अधिनियम की धारा 7/8 तथा SC/ST अधिनियम की धारा 3(ii-v) जोड़ी गई और आरोपी को गिरफ्तार कर आरोप-पत्र न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था। सत्र न्यायालय ने आरोपी युवक को निर्दोष घोषित कर दिया था, लेकिन पीड़ित पक्ष नहीं बल्कि सरकार ने सत्र न्यायालय के निर्णय को स्वीकार नहीं किया और हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाई कोर्ट के समक्ष आए मुख्य साक्ष्य और पीड़िता के बयान
उच्च न्यायालय ने मामले के रिकॉर्ड और धारा 161 व 164 Cr.P.C. के तहत दर्ज बयानों की समीक्षा के बाद निम्नलिखित मुख्य बिंदु रेखांकित किए:
- पीड़िता (बी.एस.सी. प्रथम वर्ष की छात्रा) ने अपने बयानों में स्पष्ट किया कि वह अपने कॉलेज मित्र के साथ अपनी स्वेच्छा से बाइक पर लबारिया बांध तक गई थी।
- पीड़िता ने अपने बयानों में स्पष्ट कहा कि न तो उसका अपहरण किया गया था और न ही उसके साथ कोई गलत काम (यौन उत्पीड़न या बलात्कार) हुआ था।
- जांच के दौरान पीड़िता का कोई चिकित्सीय परीक्षण (Medical Examination) नहीं कराया गया था और न ही कोई वैज्ञानिक साक्ष्य एकत्र किए गए थे।
- रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य या आरोप नहीं पाया गया कि आरोपी ने जातिगत विद्वेष या पीड़िता की जाति की जानकारी रखते हुए 10 वर्ष या उससे अधिक सजा वाले किसी अपराध को अंजाम दिया हो।
उच्च न्यायालय का निष्कर्ष एवं आदेश
न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की पीठ ने उच्चतम न्यायालय के विभिन्न कानूनी दृष्टांतों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण में यदि पुलिस द्वारा एकत्र सामग्री से अपराध के मूलभूत वैधानिक अवयव (essential ingredients) ही सिद्ध नहीं होते, तो आरोपी के खिलाफ कार्यवाही जारी रखना अनुचित है।
न्यायालय ने माना कि जांच एजेंसी को इन्वेस्टिगेशन के दौरान ऐसा कोई साक्षी मिला ही नहीं, एवं पीड़ित पक्ष द्वारा उपलब्ध भी नहीं करवाया गया कि, आरोपी के खिलाफ कोई गंभीर संदेह भी उत्पन्न होता। अतः उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की अपील को आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया और विशेष न्यायालय धार के डिस्चार्ज आदेश को सही ठहराया।
बात यहां पर भी बिल्कुल वही है। एट्रोसिटी एक्ट का दुरुपयोग किया गया, जबकि एससी एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करने का कोई आधार ही नहीं था। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि राज्य सरकार द्वारा सत्र न्यायालय के निर्णय को स्वीकार नहीं किया और हाई कोर्ट में अपील की। इसके कारण एक निर्दोष युवक को 2015 से लेकर 2026 तक, लगभग 11 साल न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ा, जेल में रहना पड़ा। एक ऐसे कलंक के साथ जीवन यापन करना पड़ा, जिसका कोई आधार ही नहीं था। सवाल यह है कि क्या इसको प्रताड़ना की श्रेणी में नहीं लिया जाएगा?
